फ़रवरी 12, 2026

हिमाचल हाईकोर्ट ने एचपीटीडीसी को बकाया वसूली में विफल रहने पर फटकार लगाई, डिफॉल्टर विभागों और निजी पक्षों की सूची मांगी

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Anoop singh

शिमला, 28 जून 2025: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम (एचपीटीडीसी) को बकाया वसूली में लापरवाही के लिए कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने निगम के प्रबंध निदेशक को निर्देश दिया है कि एक सप्ताह के भीतर उन सरकारी विभागों और निजी संस्थाओं की विस्तृत सूची सहित हलफनामा प्रस्तुत करें, जिनसे राशि वसूलनी बाकी है।

यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप शर्मा द्वारा शुक्रवार को सेवानिवृत्त कर्मचारी जय कृष्ण मेहता की याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाकर्ता अपने सेवानिवृत्ति लाभ की मांग कर रहे हैं, जो एचपीटीडीसी से लंबित है।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी:
अदालत ने टिप्पणी की कि एचपीटीडीसी को कई अवसर दिए जाने के बावजूद भी वसूली प्रक्रिया अधूरी और असंतोषजनक बनी हुई है। कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा, “प्रबंध निदेशक एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि किन सरकारी विभागों और निजी पक्षों से कितनी राशि वसूली के लिए लंबित है, और बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद भुगतान क्यों नहीं हुआ।”

पूर्व जानकारी और कोर्ट का रुख:
नवंबर 12, 2024 को एचपीटीडीसी ने अदालत को सूचित किया था कि 31 अगस्त 2024 तक सरकारी विभागों पर ₹1.68 करोड़ और निजी एवं व्यक्तिगत पक्षों पर ₹47.07 लाख बकाया हैं। हालांकि निगम द्वारा 7 नवंबर तक वसूली के प्रयास किए गए थे, लेकिन न्यायालय ने इन प्रयासों को असंतोषजनक पाया।

उसी वर्ष नवंबर में, उच्च न्यायालय ने एचपीटीडीसी के 18 घाटे में चल रहे होटलों को बंद करने का आदेश भी दिया था, जिन्हें अदालत ने “सफेद हाथी” की संज्ञा दी थी—क्योंकि कम ऑक्यूपेंसी और सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ लगातार बना हुआ था।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों का भी जिक्र:
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि निगम सेवानिवृत्त और मृतक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सूची तैयार करे ताकि उनकी बकाया राशि की भुगतान प्रक्रिया वसूली गई रकम से पूरी की जा सके।

अगली सुनवाई:
इस मामले की अगली सुनवाई अब 9 जुलाई को निर्धारित की गई है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि वसूली प्रक्रिया में अब भी कोई ठोस प्रगति नहीं होती, तो वह उचित आदेश पारित करेगी।

निष्कर्ष:
यह मामला सिर्फ वित्तीय लापरवाही का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। कोर्ट की इस सख्ती से यह स्पष्ट है कि अब सरकार से जुड़े निगमों को जवाब देना होगा और बकाया वसूली में लापरवाही की कोई जगह नहीं रहेगी।


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