फ़रवरी 12, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म और डकैती का मामला समझौते के बाद रद्द किया, दोनों पक्षों पर लगाया जुर्माना

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Anoop singh

लखनऊ, 29 जून 2025 – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जहाँ सामूहिक दुष्कर्म और डकैती जैसे आरोपों से जुड़ा मुकदमा दोनों पक्षों के बीच हुए आपसी समझौते के चलते रद्द कर दिया गया। न्यायालय ने न केवल मामला खारिज किया बल्कि शिकायतकर्ता (पीड़िता) और आरोपियों – सभी पर ₹2,000 का जुर्माना भी लगाया।

यह मामला बदायूं ज़िले से संबंधित था, जिसमें मुनीश और दो अन्य व्यक्तियों पर आरोप लगाए गए थे। न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकल पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। उन्होंने अपने निर्णय में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “कानून न्याय का माध्यम है, साज़िश का हथियार नहीं।”

न्यायपालिका की सख़्त चेतावनी

न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जहाँ गंभीर धाराओं के अंतर्गत मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं – जैसे सामूहिक बलात्कार – और फिर समझौते या व्यक्तिगत लाभ के लिए शिकायतकर्ता अपने बयान वापस ले लेते हैं। इस प्रकार न्याय प्रणाली का मज़ाक बनाया जा रहा है।

न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा कि अदालतें “मूक दर्शक” नहीं बन सकतीं जब कानून का दुरुपयोग हो रहा हो। उन्होंने यह भी चेताया कि यदि इस तरह की प्रवृत्तियों को समय रहते नहीं रोका गया तो यह देश की न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर कर देगा।

क्या कहता है यह फैसला?

यह निर्णय न्यायपालिका की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें वह कानून की गरिमा बनाए रखने और झूठे मुकदमों के माध्यम से हो रही न्यायिक प्रक्रिया की बर्बादी को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, यह निर्णय आने वाले समय में ऐसे मामलों में एक नज़ीर के रूप में भी प्रस्तुत हो सकता है।

सामाजिक संदेश

इस मामले में सबसे बड़ा संदेश यह है कि कानून का प्रयोग दबाव, प्रतिशोध या जबरदस्ती धन वसूलने जैसे गलत इरादों से नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई शिकायतकर्ता झूठा मामला दर्ज करता है, तो उससे न केवल न्याय का हनन होता है, बल्कि उन सच्चे पीड़ितों के लिए भी न्याय पाना कठिन हो जाता है, जो वाकई में पीड़ा झेल रहे होते हैं।


निष्कर्ष:
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक कानूनी निर्णय है, बल्कि एक नैतिक संदेश भी है – कि कानून की छाया में न्याय की उम्मीद की जाए, न कि निजी स्वार्थों की पूर्ति। अदालत का यह रुख न्यायिक प्रणाली की गंभीरता और निष्पक्षता को दर्शाता है, जो आने वाले समय में झूठे मुकदमों पर रोक लगाने में सहायक हो सकता है।


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