फ़रवरी 12, 2026

CIC की सुनवाई में आमजन की पहुंच पर रोक: दिल्ली उच्च न्यायालय का विवेकपूर्ण फैसला

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Anoop singh

🔰 प्रस्तावना
भारत में लोकतंत्र की जड़ें पारदर्शिता और जवाबदेही पर टिकी हैं, और इसी का प्रमुख औजार है सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI)। यह अधिनियम न केवल नागरिकों को सूचित रहने का अधिकार देता है, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने का माध्यम भी है। ऐसे में जब केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की सुनवाई प्रक्रिया को आम जनता और पत्रकारों के लिए बंद किया जाता है, तो यह एक बड़ा लोकतांत्रिक मुद्दा बन जाता है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा इस पर दिया गया निर्णय काफी चर्चा में रहा है।


📂 याचिका की पृष्ठभूमि
कुछ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उच्च न्यायालय का रुख करते हुए यह मांग की कि CIC की सुनवाई में शारीरिक या वर्चुअल रूप से आम नागरिकों और मीडिया को शामिल होने दिया जाए। उनका कहना था कि इससे निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और लोकतांत्रिक मूल्य सुदृढ़ होंगे।


⚖️ अदालत का दृष्टिकोण
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति अनिश दयाल की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने माना कि:

  • पारदर्शिता लोकतंत्र का मूलभूत आधार है, जिसे नकारा नहीं जा सकता।
  • लेकिन ऐसी किसी भी व्यवस्था को लागू करने के लिए तकनीकी, आर्थिक और संस्थागत आधार पहले से मौजूद होना चाहिए।
  • लाइव स्ट्रीमिंग या डिजिटल एक्सेस को लागू करना अचानक और बिना तैयारी के संभव नहीं है।

🧩 वैकल्पिक मार्गदर्शन
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह सुझाव भी दिया कि वे यदि चाहें तो व्यक्तिगत रूप से CIC की कार्यवाहियों में भाग लेने के लिए आयोग से अनुमति ले सकते हैं। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि CIC के पास इस संबंध में पहले से आंतरिक दिशा-निर्देश और प्रक्रिया मौजूद हैं।


🌐 व्यापक दृष्टिकोण
यह मामला केवल CIC की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के वर्षों में अपनी कार्यवाहियों को सार्वजनिक करने के लिए लाइव स्ट्रीमिंग की पहल की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि देश में न्यायिक पारदर्शिता की मांग लगातार बढ़ रही है। यह पूरी प्रक्रिया बताती है कि RTI केवल जानकारी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन पर जन निगरानी का अधिकार है।


📝 निष्कर्ष
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय एक तरफ जहां संस्थागत सीमाओं को स्वीकार करता है, वहीं दूसरी ओर यह भी संकेत देता है कि भविष्य में अधिक पारदर्शिता की दिशा में काम होना चाहिए। सूचना का अधिकार केवल कागज़ी दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सुनवाई की प्रक्रिया तक आम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। यह मुद्दा हमें सोचने पर विवश करता है कि क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर अग्रसर हैं, जहां सूचना केवल अधिकार नहीं, बल्कि बदलाव और भागीदारी का औजार बन सके?


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