फ़रवरी 12, 2026

⚔️ मैसूर युद्ध: दक्षिण भारत की निर्णायक लड़ाइयाँ

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भारत के इतिहास में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लड़ी गई मैसूर युद्धों की श्रृंखला ने न केवल दक्षिण भारत की राजनीतिक दिशा बदली, बल्कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्ति को भी सुदृढ़ किया। ये युद्ध मुख्य रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मैसूर साम्राज्य के बीच लड़े गए, जिसमें मैसूर के शक्तिशाली शासक हैदर अली और बाद में उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने कंपनी की बढ़ती ताकत को चुनौती दी।


1. पृष्ठभूमि

18वीं शताब्दी में मैसूर एक संगठित और मजबूत राज्य था, जो आधुनिक कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में फैला था। हैदर अली के नेतृत्व में यह राज्य सैन्य शक्ति और प्रशासनिक कुशलता के लिए प्रसिद्ध हुआ। दूसरी ओर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी दक्षिण भारत में अपना व्यापारिक व राजनीतिक प्रभाव बढ़ा रही थी, जिससे टकराव अनिवार्य हो गया।


2. चार प्रमुख युद्ध

मैसूर और अंग्रेजों के बीच कुल चार बड़े युद्ध हुए:

  1. पहला मैसूर युद्ध (1767–1769)
    हैदर अली ने ब्रिटिशों के विरुद्ध हैदराबाद के निज़ाम और मराठों के साथ गठबंधन कर जोरदार संघर्ष किया। अंत में दोनों पक्षों के बीच मद्रास संधि हुई, जिसमें परस्पर सहयोग का वादा किया गया।
  2. दूसरा मैसूर युद्ध (1780–1784)
    अंग्रेजों के वचनभंग से नाराज हैदर अली ने फिर से युद्ध छेड़ा। इस युद्ध में फ्रांसीसी सेना ने मैसूर का साथ दिया। हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने मोर्चा संभाला। मैंगलोर संधि के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ।
  3. तीसरा मैसूर युद्ध (1790–1792)
    ब्रिटिशों ने मराठों और हैदराबाद के निज़ाम के साथ मिलकर टीपू सुल्तान पर हमला किया। अंततः श्रीरंगपट्टनम की संधि में टीपू को अपने राज्य का आधा हिस्सा छोड़ना पड़ा।
  4. चौथा मैसूर युद्ध (1799)
    यह निर्णायक युद्ध था। ब्रिटिश सेनाओं ने श्रीरंगपट्टनम पर घेरा डाल दिया। बहादुरी से लड़ते हुए टीपू सुल्तान युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। इसके साथ ही मैसूर पर ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित हो गया।

3. महत्व और परिणाम

  • ब्रिटिश शक्ति का विस्तार: मैसूर की पराजय के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेजों का वर्चस्व मजबूत हो गया।
  • फ्रांसीसी प्रभाव में कमी: फ्रांस, जो टीपू सुल्तान का सहयोगी था, भारत में अपना राजनीतिक आधार खो बैठा।
  • स्थानीय राजवंश की बहाली: वोडेयार वंश को अंग्रेजों की अधीनता में पुनः गद्दी पर बैठाया गया।
  • भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की प्रेरणा: टीपू सुल्तान का साहस और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया।

4. निष्कर्ष

मैसूर युद्ध केवल सत्ता संघर्ष नहीं थे, बल्कि यह भारत के औपनिवेशिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ थे। हैदर अली और टीपू सुल्तान ने अद्भुत सैन्य कौशल और साहस से अंग्रेजी साम्राज्य को लंबे समय तक चुनौती दी। उनकी शहादत और संघर्ष आज भी भारत के इतिहास में गौरवपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हैं।


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