करुआ बाबा के धाम पर मकर संक्रांति का दंगल

आस्था, परंपरा और शौर्य का जीवंत संगम
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले का रामनगर ब्लॉक अपने भीतर एक ऐसी परंपरा समेटे हुए है, जो केवल खेल नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। ग्राम पंचायत बरुआ में स्थित करुआ बाबा का मंदिर मैदान, हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन एक ऐसे विराट दंगल का साक्षी बनता है, जो आसपास के अनेकों जिलों में प्रसिद्ध है।
करुआ बाबा: श्रद्धा का केंद्र
स्थानीय मान्यता के अनुसार करुआ बाबा क्षेत्र के रक्षक और लोकदेवता माने जाते हैं। ग्रामीणों की आस्था है कि बाबा की कृपा से गांव में समृद्धि, साहस और मेल-मिलाप बना रहता है। दंगल से पूर्व पहलवान और दर्शक मंदिर में शीश नवाकर बाबा का आशीर्वाद लेते हैं, जिससे प्रतियोगिता निष्पक्ष और मंगलमय बनी रहे।
मकर संक्रांति और दंगल की परंपरा
मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है, जिसे नई ऊर्जा और सामर्थ्य का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन करुआ बाबा के प्रांगण में लगने वाला दंगल केवल शारीरिक शक्ति की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और सम्मान का उत्सव होता है। कहा जाता है कि यह दंगल कई पीढ़ियों से बिना किसी व्यवधान के आयोजित हो रहा है।
दूर-दराज से जुटते हैं पहलवान
बरुआ का यह दंगल स्थानीय सीमाओं से आगे जाकर पहचान बना चुका है। चित्रकूट के साथ-साथ बांदा, प्रयागराज, महोबा और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों से भी नामी पहलवान यहां अपनी किस्मत आजमाने पहुंचते हैं। अखाड़े में उतरते ही जयकारों से वातावरण गूंज उठता है और पूरा गांव उत्सव स्थल में बदल जाता है।
सामाजिक एकता का प्रतीक
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी सामाजिक समरसता। जाति, वर्ग या क्षेत्र का कोई भेदभाव नहीं होता। बुजुर्ग अनुभव साझा करते हैं, युवा आयोजन संभालते हैं और महिलाएं पारंपरिक ढंग से मेहमानों का स्वागत करती हैं। दंगल यहां प्रतिस्पर्धा से ज़्यादा भाईचारे का माध्यम बन जाता है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब आधुनिक खेल और डिजिटल मनोरंजन हावी हैं, ऐसे में करुआ बाबा का दंगल युवाओं को अपनी मिट्टी से जोड़ने का कार्य करता है। यह आयोजन उन्हें शारीरिक फिटनेस, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाता है।
विरासत जिसे सहेजना ज़रूरी
करुआ बाबा के मंदिर मैदान पर लगने वाला मकर संक्रांति का दंगल केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि चित्रकूट की लोकसंस्कृति की जीवित पहचान है। इसे संरक्षित करना और आगे बढ़ाना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने जैसा है।

