भाजपा शासन पर बढ़ते सवाल: भ्रष्टाचार और प्रशासनिक गड़बड़ियों की परतें

देश की राजनीति में सत्ता की भूमिका केवल नीतियाँ बनाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि शासन की गुणवत्ता और प्रशासन की ईमानदारी भी उसी से आँकी जाती है। हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा शासित व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है।
सत्ता और सिस्टम पर आरोप
अखिलेश यादव का कहना है कि वर्तमान शासन में सत्ता, प्रशासन और अव्यवस्था एक-दूसरे से इस कदर जुड़े हुए हैं कि आम नागरिक के लिए न्याय पाना कठिन होता जा रहा है। उनके अनुसार, यह रिश्ता अब सामान्य संवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे मजबूत नेटवर्क में बदल गया है जहाँ जवाबदेही कमजोर और लेन-देन मजबूत हो गया है।
उनका तर्क है कि भ्रष्टाचार अब छिपा नहीं रहा, बल्कि व्यवस्था के भीतर गहराई तक जड़ें जमा चुका है, जिससे सरकारी ढांचे की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
प्रशासनिक चूक और जमीनी सच्चाई
बांदा जेल से जुड़ा मामला प्रशासनिक खामियों का ताजा उदाहरण माना जा रहा है। सुरक्षा व्यवस्था में कथित चूकों और प्रबंधन की लापरवाही ने न केवल जेल प्रशासन बल्कि पूरे कानून-व्यवस्था तंत्र की कार्यकुशलता पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। विपक्ष इसे शासन की विफलता के रूप में देख रहा है।
सियासी असर और संदेश
- विपक्ष का दावा है कि सरकार ने पारदर्शिता को प्राथमिकता से हटा दिया है।
- लगातार उठ रहे भ्रष्टाचार के आरोप जनता में असंतोष को जन्म दे रहे हैं।
- प्रशासनिक कमजोरियों से राज्य की कानून-व्यवस्था की साख प्रभावित हो रही है।
आम नागरिक की चिंता
आम जनता के लिए ये मुद्दे केवल राजनीतिक बयान नहीं हैं। जब प्रशासन प्रभावी नहीं होता, तो उसका सीधा असर सुरक्षा, न्याय और भरोसे पर पड़ता है। नागरिकों को लगता है कि उनकी आवाज़ सत्ता के शोर में दबती जा रही है।
निष्कर्ष
अखिलेश यादव के आरोप एक राजनीतिक चुनौती के रूप में सामने आए हैं, लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या शासन तंत्र को वास्तव में पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकेगा? यदि व्यवस्था के भीतर फैली अनियमितताओं पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो लोकतंत्र में जनता का विश्वास कमजोर होना तय है।
