ओआईएस अधिकारियों के प्रशिक्षण में सोशल मीडिया और एआई आधारित संचार पर जोर, डिजिटल युग की चुनौतियों पर हुई चर्चा

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सुदाम बाबू स्टेट ब्यूरो ओडिशा

हिट एंड हॉट न्यूज़

भुवनेश्वर, 9 अक्टूबर 2026। डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बदलते दौर में सरकारी सूचनाओं को आम नागरिकों तक प्रभावी, सटीक और विश्वसनीय तरीके से पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ओडिशा सूचना सेवा (ओआईएस) के अधिकारियों के लिए आयोजित एक दिवसीय अभिमुखीकरण कार्यक्रम के दूसरे तकनीकी सत्र में आधुनिक संचार माध्यमों की भूमिका, अवसरों और उनसे जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

इस सत्र का मुख्य विषय ‘सोशल मीडिया के बदलते रुझान: सरकारी सूचना अधिकारियों के लिए अवसर और चुनौतियां’ रहा। कार्यक्रम में भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), ढेंकनाल के क्षेत्रीय निदेशक प्रोफेसर आनंद प्रधान मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने अधिकारियों को डिजिटल संचार की बदलती प्रकृति, एआई के बढ़ते प्रभाव और नागरिकों तक सूचनाएं पहुंचाने के नए तरीकों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी।

पारंपरिक मीडिया से डिजिटल संचार तक बदलता परिदृश्य

प्रोफेसर आनंद प्रधान ने अपने संबोधन में बताया कि सूचना प्रसार की दुनिया में पिछले कुछ वर्षों के दौरान व्यापक बदलाव आया है। पहले सरकारी विभागों की सूचनाएं मुख्य रूप से समाचार पत्रों, रेडियो, टेलीविजन और प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से जनता तक पहुंचती थीं। अब सोशल मीडिया, डिजिटल समाचार मंचों, वीडियो प्लेटफॉर्म और एआई आधारित सूचना प्रणालियों ने संचार के तरीकों को अधिक व्यापक और तेज बना दिया है।

आज नागरिक केवल सूचना प्राप्त करने वाले नहीं हैं, बल्कि वे सवाल पूछते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं और विभिन्न डिजिटल मंचों पर सरकारी कार्यों से संबंधित चर्चाओं में भी भाग लेते हैं। ऐसी स्थिति में सरकारी सूचना अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल समाचार जारी करने तक सीमित नहीं रह जाती। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होता है कि संबंधित जानकारी सही समय पर, सही प्रारूप में और उपयुक्त माध्यम के जरिए लोगों तक पहुंचे।

उन्होंने अधिकारियों को सलाह दी कि वे तकनीकी बदलावों के प्रति सजग रहें और नागरिकों की बदलती जरूरतों को समझते हुए अपनी कार्यशैली में आवश्यक सुधार करें।

SEO से मशीन डिस्कवरी ऑप्टिमाइजेशन की ओर बढ़ता रुझान

तकनीकी सत्र का एक महत्वपूर्ण विषय सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (एसईओ) से आगे बढ़कर मशीन डिस्कवरी ऑप्टिमाइजेशन की आवश्यकता रहा। प्रोफेसर प्रधान ने समझाया कि डिजिटल दुनिया में अब केवल किसी वेबसाइट या समाचार सामग्री को सर्च इंजन में स्थान दिलाना पर्याप्त नहीं है। एआई आधारित प्रणालियों के विस्तार के साथ यह भी जरूरी हो गया है कि आधिकारिक सूचनाएं मशीनों द्वारा आसानी से पहचानी, समझी और खोजी जा सकें।

इस दिशा में सरकारी विभागों को अपनी डिजिटल सामग्री की गुणवत्ता, स्पष्टता और संरचना पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सूचनाओं में तथ्यात्मक सटीकता, स्पष्ट शीर्षक, प्रासंगिक विवरण और भरोसेमंद स्रोतों का उल्लेख होना चाहिए, ताकि नागरिकों को आवश्यक जानकारी खोजने में परेशानी न हो।

सरकारी योजनाओं, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों, प्रशासनिक निर्णयों और नागरिक सेवाओं से संबंधित जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना भी जरूरी है। इससे डिजिटल माध्यमों पर आधिकारिक सामग्री की उपयोगिता बढ़ सकती है और गलत या अधूरी जानकारी पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए अलग संचार रणनीति

प्रोफेसर आनंद प्रधान ने अधिकारियों का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया कि सभी सोशल मीडिया मंचों की प्रकृति और उपयोगकर्ता वर्ग एक जैसे नहीं होते। इसलिए प्रत्येक प्लेटफॉर्म पर एक ही प्रकार की सामग्री प्रकाशित करना प्रभावी रणनीति नहीं माना जा सकता।

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी सूचना अधिकारियों को मंच की विशेषताओं, लक्षित दर्शकों और उपलब्ध संचार प्रारूपों के अनुसार सामग्री तैयार करनी चाहिए। कहीं संक्षिप्त संदेश अधिक उपयोगी हो सकते हैं, तो कहीं विस्तृत लेख, चित्र, ग्राफिक्स या वीडियो के माध्यम से जानकारी बेहतर ढंग से समझाई जा सकती है।

विशेष रूप से सरकारी योजनाओं और नागरिकों से जुड़ी सेवाओं की जानकारी को सरल, आकर्षक और आसानी से समझ आने वाले स्वरूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सामग्री तैयार करते समय उसका उद्देश्य केवल अधिक लोगों तक पहुंच बनाना नहीं होना चाहिए। सूचना की प्रामाणिकता, उपयोगिता और नागरिकों के लिए उसकी प्रासंगिकता को भी समान महत्व देना आवश्यक है।

डिजिटल युग में ध्यान आकर्षित करना बड़ी चुनौती

सत्र में ‘अटेंशन इकोनॉमी’ यानी लोगों का ध्यान आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा पर भी चर्चा हुई। इंटरनेट पर हर दिन बड़ी मात्रा में नई सामग्री प्रकाशित हो रही है। समाचार, वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य डिजिटल सूचनाओं की इस लगातार बढ़ती उपलब्धता के कारण नागरिकों के लिए जरूरी जानकारी को पहचानना कई बार कठिन हो जाता है।

ऐसे माहौल में सरकारी विभागों के सामने चुनौती है कि वे अपनी महत्वपूर्ण सूचनाओं को इस तरह प्रस्तुत करें कि नागरिक उन्हें आसानी से समझ सकें और उन पर भरोसा कर सकें।

इसके लिए संक्षिप्त तथा स्पष्ट संदेश, प्रभावी प्रस्तुति, उचित समय पर सूचना का प्रकाशन और नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप सामग्री तैयार करना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, केवल लोकप्रियता या अधिक प्रतिक्रियाएं प्राप्त करने के उद्देश्य से तथ्यों से समझौता करना उचित नहीं है।

सरकारी संचार की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए सूचना को आकर्षक बनाने के साथ उसकी सत्यता और आधिकारिक आधार बनाए रखना भी जरूरी है।

अफवाहों, गलत सूचनाओं और डीपफेक से निपटने पर जोर

डिजिटल संचार के विस्तार के साथ गलत सूचनाओं, अफवाहों और डीपफेक जैसी तकनीकों से उत्पन्न होने वाली चुनौतियां भी बढ़ी हैं। सोशल मीडिया पर किसी भ्रामक संदेश या छेड़छाड़ किए गए वीडियो का तेजी से प्रसार लोगों के बीच भ्रम पैदा कर सकता है और सरकारी संस्थानों के प्रति विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

इस विषय पर प्रोफेसर प्रधान ने सरकारी सूचना अधिकारियों को तथ्य सत्यापन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच की जानी चाहिए। अपुष्ट दावों को आधिकारिक जानकारी के रूप में प्रसारित करने से बचना जरूरी है।

यदि किसी सरकारी निर्णय, घटना या योजना के संबंध में गलत जानकारी प्रसारित होती है, तो संबंधित विभाग को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर समय रहते स्पष्टीकरण देना चाहिए। आधिकारिक वेबसाइट, प्रमाणित दस्तावेजों और संबंधित विभागों से प्राप्त जानकारी का उपयोग करके भ्रामक दावों की वास्तविकता स्पष्ट की जा सकती है।

एआई आधारित उपकरणों का उपयोग करते समय भी जिम्मेदारी और सावधानी आवश्यक है। तकनीक सूचना तैयार करने तथा विश्लेषण में मदद कर सकती है, लेकिन उसके परिणामों की जांच करना और अंतिम सामग्री की सटीकता सुनिश्चित करना अधिकारियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बनी रहती है।

ब्रॉडकास्टिंग से नैरोकास्टिंग तक संचार की नई दिशा

कार्यक्रम में व्यापक स्तर पर एक जैसी सूचना प्रसारित करने वाली पारंपरिक ब्रॉडकास्टिंग पद्धति से आगे बढ़कर नैरोकास्टिंग की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला गया। नैरोकास्टिंग का आशय किसी विशेष समूह, क्षेत्र या जरूरत के अनुसार लक्षित जानकारी पहुंचाने से है।

उदाहरण के लिए, किसी जिले में संचालित सरकारी योजना की जानकारी उस क्षेत्र के नागरिकों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय भाषा, क्षेत्रीय सोशल मीडिया समूहों और उपयुक्त डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह विद्यार्थियों, किसानों, महिलाओं, युवाओं या अन्य लक्षित समूहों के लिए उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सूचना तैयार की जा सकती है।

इस तरीके से नागरिकों को उनके लिए प्रासंगिक जानकारी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। हालांकि, ऐसी रणनीति बनाते समय निष्पक्षता, समान सूचना उपलब्धता और नागरिकों की निजता का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।

वीडियो स्टोरीटेलिंग और नागरिकों से संवाद का महत्व

प्रोफेसर प्रधान ने वीडियो आधारित स्टोरीटेलिंग को भी आधुनिक सरकारी संचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। दृश्य माध्यमों के जरिए किसी योजना की प्रक्रिया, उसके लाभ, आवेदन करने के तरीके और संबंधित सेवाओं को अपेक्षाकृत सरलता से समझाया जा सकता है।

सरकारी विभाग यदि उपयोगी वीडियो, जानकारीपूर्ण दृश्य सामग्री और नागरिकों के सामान्य प्रश्नों पर आधारित प्रस्तुतियां तैयार करें, तो जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझना आसान हो सकता है।

उन्होंने सोशल मीडिया को केवल सरकारी घोषणाएं प्रकाशित करने का माध्यम मानने के बजाय नागरिकों के साथ सार्थक संबंध विकसित करने का मंच बनाने पर भी जोर दिया। नागरिकों की प्रतिक्रियाएं सुनना, उनके सवालों का जवाब देना और आवश्यक सुझावों पर ध्यान देना संवाद को अधिक प्रभावी बना सकता है।

इस प्रकार सोशल मीडिया का उपयोग एकतरफा सूचना प्रसार से आगे बढ़कर सहभागिता और जनसंवाद को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।

सवाल-जवाब के जरिए अधिकारियों ने साझा किए अनुभव

तकनीकी सत्र के अंत में संवादात्मक प्रश्नोत्तर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान अधिकारियों ने डिजिटल मीडिया के व्यावहारिक उपयोग, सूचनाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने, सोशल मीडिया पर सामग्री की पहुंच बढ़ाने और एल्गोरिदम आधारित वातावरण में आधिकारिक संदेशों को प्रभावी बनाने से संबंधित विषयों पर चर्चा की।

इस चर्चा ने अधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्र में सामने आने वाली चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर विचार करने का अवसर प्रदान किया।

कार्यक्रम में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक संजय कुमार बिस्वाल ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर आनंद प्रधान को सम्मानित किया। जनसंपर्क अधिकारी अंशुमान साहू और कृष्णकेशी बालियारसिंह ने सत्र के समन्वय की जिम्मेदारी निभाई।

जिम्मेदार डिजिटल संचार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

ओआईएस अधिकारियों के लिए आयोजित यह तकनीकी सत्र बदलते डिजिटल परिवेश में सरकारी संचार व्यवस्था को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा। इसमें आधुनिक तकनीक के उपयोग के साथ तथ्यात्मक शुद्धता, पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष ध्यान दिया गया।

आज के समय में सरकारी सूचना अधिकारियों के लिए तकनीकी दक्षता के साथ सही जानकारी की पहचान करना, उसे सरल भाषा में प्रस्तुत करना और भ्रामक सामग्री का जिम्मेदारी से मुकाबला करना आवश्यक है।

एआई और सोशल मीडिया भविष्य में सरकारी संचार को और अधिक व्यापक बना सकते हैं। लेकिन इन माध्यमों की वास्तविक उपयोगिता तभी सुनिश्चित होगी, जब उनका इस्तेमाल जनहित, विश्वसनीयता और जिम्मेदारी को केंद्र में रखकर किया जाएगा। यही दृष्टिकोण नागरिकों और प्रशासन के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने में सहायक बन सकता है।

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ओआईएस अधिकारियों के प्रशिक्षण में सोशल मीडिया और एआई आधारित संचार पर जोर, डिजिटल युग की चुनौतियों पर हुई चर्चा

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:अक्टूबर 9, 2026

सुदाम बाबू स्टेट ब्यूरो ओडिशा

हिट एंड हॉट न्यूज़

भुवनेश्वर, 9 अक्टूबर 2026। डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बदलते दौर में सरकारी सूचनाओं को आम नागरिकों तक प्रभावी, सटीक और विश्वसनीय तरीके से पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ओडिशा सूचना सेवा (ओआईएस) के अधिकारियों के लिए आयोजित एक दिवसीय अभिमुखीकरण कार्यक्रम के दूसरे तकनीकी सत्र में आधुनिक संचार माध्यमों की भूमिका, अवसरों और उनसे जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

इस सत्र का मुख्य विषय ‘सोशल मीडिया के बदलते रुझान: सरकारी सूचना अधिकारियों के लिए अवसर और चुनौतियां’ रहा। कार्यक्रम में भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), ढेंकनाल के क्षेत्रीय निदेशक प्रोफेसर आनंद प्रधान मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने अधिकारियों को डिजिटल संचार की बदलती प्रकृति, एआई के बढ़ते प्रभाव और नागरिकों तक सूचनाएं पहुंचाने के नए तरीकों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी।

पारंपरिक मीडिया से डिजिटल संचार तक बदलता परिदृश्य

प्रोफेसर आनंद प्रधान ने अपने संबोधन में बताया कि सूचना प्रसार की दुनिया में पिछले कुछ वर्षों के दौरान व्यापक बदलाव आया है। पहले सरकारी विभागों की सूचनाएं मुख्य रूप से समाचार पत्रों, रेडियो, टेलीविजन और प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से जनता तक पहुंचती थीं। अब सोशल मीडिया, डिजिटल समाचार मंचों, वीडियो प्लेटफॉर्म और एआई आधारित सूचना प्रणालियों ने संचार के तरीकों को अधिक व्यापक और तेज बना दिया है।

आज नागरिक केवल सूचना प्राप्त करने वाले नहीं हैं, बल्कि वे सवाल पूछते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं और विभिन्न डिजिटल मंचों पर सरकारी कार्यों से संबंधित चर्चाओं में भी भाग लेते हैं। ऐसी स्थिति में सरकारी सूचना अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल समाचार जारी करने तक सीमित नहीं रह जाती। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होता है कि संबंधित जानकारी सही समय पर, सही प्रारूप में और उपयुक्त माध्यम के जरिए लोगों तक पहुंचे।

उन्होंने अधिकारियों को सलाह दी कि वे तकनीकी बदलावों के प्रति सजग रहें और नागरिकों की बदलती जरूरतों को समझते हुए अपनी कार्यशैली में आवश्यक सुधार करें।

SEO से मशीन डिस्कवरी ऑप्टिमाइजेशन की ओर बढ़ता रुझान

तकनीकी सत्र का एक महत्वपूर्ण विषय सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (एसईओ) से आगे बढ़कर मशीन डिस्कवरी ऑप्टिमाइजेशन की आवश्यकता रहा। प्रोफेसर प्रधान ने समझाया कि डिजिटल दुनिया में अब केवल किसी वेबसाइट या समाचार सामग्री को सर्च इंजन में स्थान दिलाना पर्याप्त नहीं है। एआई आधारित प्रणालियों के विस्तार के साथ यह भी जरूरी हो गया है कि आधिकारिक सूचनाएं मशीनों द्वारा आसानी से पहचानी, समझी और खोजी जा सकें।

इस दिशा में सरकारी विभागों को अपनी डिजिटल सामग्री की गुणवत्ता, स्पष्टता और संरचना पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सूचनाओं में तथ्यात्मक सटीकता, स्पष्ट शीर्षक, प्रासंगिक विवरण और भरोसेमंद स्रोतों का उल्लेख होना चाहिए, ताकि नागरिकों को आवश्यक जानकारी खोजने में परेशानी न हो।

सरकारी योजनाओं, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों, प्रशासनिक निर्णयों और नागरिक सेवाओं से संबंधित जानकारी को सरल भाषा में प्रस्तुत करना भी जरूरी है। इससे डिजिटल माध्यमों पर आधिकारिक सामग्री की उपयोगिता बढ़ सकती है और गलत या अधूरी जानकारी पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए अलग संचार रणनीति

प्रोफेसर आनंद प्रधान ने अधिकारियों का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया कि सभी सोशल मीडिया मंचों की प्रकृति और उपयोगकर्ता वर्ग एक जैसे नहीं होते। इसलिए प्रत्येक प्लेटफॉर्म पर एक ही प्रकार की सामग्री प्रकाशित करना प्रभावी रणनीति नहीं माना जा सकता।

उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी सूचना अधिकारियों को मंच की विशेषताओं, लक्षित दर्शकों और उपलब्ध संचार प्रारूपों के अनुसार सामग्री तैयार करनी चाहिए। कहीं संक्षिप्त संदेश अधिक उपयोगी हो सकते हैं, तो कहीं विस्तृत लेख, चित्र, ग्राफिक्स या वीडियो के माध्यम से जानकारी बेहतर ढंग से समझाई जा सकती है।

विशेष रूप से सरकारी योजनाओं और नागरिकों से जुड़ी सेवाओं की जानकारी को सरल, आकर्षक और आसानी से समझ आने वाले स्वरूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सामग्री तैयार करते समय उसका उद्देश्य केवल अधिक लोगों तक पहुंच बनाना नहीं होना चाहिए। सूचना की प्रामाणिकता, उपयोगिता और नागरिकों के लिए उसकी प्रासंगिकता को भी समान महत्व देना आवश्यक है।

डिजिटल युग में ध्यान आकर्षित करना बड़ी चुनौती

सत्र में ‘अटेंशन इकोनॉमी’ यानी लोगों का ध्यान आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा पर भी चर्चा हुई। इंटरनेट पर हर दिन बड़ी मात्रा में नई सामग्री प्रकाशित हो रही है। समाचार, वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य डिजिटल सूचनाओं की इस लगातार बढ़ती उपलब्धता के कारण नागरिकों के लिए जरूरी जानकारी को पहचानना कई बार कठिन हो जाता है।

ऐसे माहौल में सरकारी विभागों के सामने चुनौती है कि वे अपनी महत्वपूर्ण सूचनाओं को इस तरह प्रस्तुत करें कि नागरिक उन्हें आसानी से समझ सकें और उन पर भरोसा कर सकें।

इसके लिए संक्षिप्त तथा स्पष्ट संदेश, प्रभावी प्रस्तुति, उचित समय पर सूचना का प्रकाशन और नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप सामग्री तैयार करना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, केवल लोकप्रियता या अधिक प्रतिक्रियाएं प्राप्त करने के उद्देश्य से तथ्यों से समझौता करना उचित नहीं है।

सरकारी संचार की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए सूचना को आकर्षक बनाने के साथ उसकी सत्यता और आधिकारिक आधार बनाए रखना भी जरूरी है।

अफवाहों, गलत सूचनाओं और डीपफेक से निपटने पर जोर

डिजिटल संचार के विस्तार के साथ गलत सूचनाओं, अफवाहों और डीपफेक जैसी तकनीकों से उत्पन्न होने वाली चुनौतियां भी बढ़ी हैं। सोशल मीडिया पर किसी भ्रामक संदेश या छेड़छाड़ किए गए वीडियो का तेजी से प्रसार लोगों के बीच भ्रम पैदा कर सकता है और सरकारी संस्थानों के प्रति विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

इस विषय पर प्रोफेसर प्रधान ने सरकारी सूचना अधिकारियों को तथ्य सत्यापन की प्रक्रिया को प्राथमिकता देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच की जानी चाहिए। अपुष्ट दावों को आधिकारिक जानकारी के रूप में प्रसारित करने से बचना जरूरी है।

यदि किसी सरकारी निर्णय, घटना या योजना के संबंध में गलत जानकारी प्रसारित होती है, तो संबंधित विभाग को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर समय रहते स्पष्टीकरण देना चाहिए। आधिकारिक वेबसाइट, प्रमाणित दस्तावेजों और संबंधित विभागों से प्राप्त जानकारी का उपयोग करके भ्रामक दावों की वास्तविकता स्पष्ट की जा सकती है।

एआई आधारित उपकरणों का उपयोग करते समय भी जिम्मेदारी और सावधानी आवश्यक है। तकनीक सूचना तैयार करने तथा विश्लेषण में मदद कर सकती है, लेकिन उसके परिणामों की जांच करना और अंतिम सामग्री की सटीकता सुनिश्चित करना अधिकारियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बनी रहती है।

ब्रॉडकास्टिंग से नैरोकास्टिंग तक संचार की नई दिशा

कार्यक्रम में व्यापक स्तर पर एक जैसी सूचना प्रसारित करने वाली पारंपरिक ब्रॉडकास्टिंग पद्धति से आगे बढ़कर नैरोकास्टिंग की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला गया। नैरोकास्टिंग का आशय किसी विशेष समूह, क्षेत्र या जरूरत के अनुसार लक्षित जानकारी पहुंचाने से है।

उदाहरण के लिए, किसी जिले में संचालित सरकारी योजना की जानकारी उस क्षेत्र के नागरिकों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय भाषा, क्षेत्रीय सोशल मीडिया समूहों और उपयुक्त डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह विद्यार्थियों, किसानों, महिलाओं, युवाओं या अन्य लक्षित समूहों के लिए उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सूचना तैयार की जा सकती है।

इस तरीके से नागरिकों को उनके लिए प्रासंगिक जानकारी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। हालांकि, ऐसी रणनीति बनाते समय निष्पक्षता, समान सूचना उपलब्धता और नागरिकों की निजता का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।

वीडियो स्टोरीटेलिंग और नागरिकों से संवाद का महत्व

प्रोफेसर प्रधान ने वीडियो आधारित स्टोरीटेलिंग को भी आधुनिक सरकारी संचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। दृश्य माध्यमों के जरिए किसी योजना की प्रक्रिया, उसके लाभ, आवेदन करने के तरीके और संबंधित सेवाओं को अपेक्षाकृत सरलता से समझाया जा सकता है।

सरकारी विभाग यदि उपयोगी वीडियो, जानकारीपूर्ण दृश्य सामग्री और नागरिकों के सामान्य प्रश्नों पर आधारित प्रस्तुतियां तैयार करें, तो जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझना आसान हो सकता है।

उन्होंने सोशल मीडिया को केवल सरकारी घोषणाएं प्रकाशित करने का माध्यम मानने के बजाय नागरिकों के साथ सार्थक संबंध विकसित करने का मंच बनाने पर भी जोर दिया। नागरिकों की प्रतिक्रियाएं सुनना, उनके सवालों का जवाब देना और आवश्यक सुझावों पर ध्यान देना संवाद को अधिक प्रभावी बना सकता है।

इस प्रकार सोशल मीडिया का उपयोग एकतरफा सूचना प्रसार से आगे बढ़कर सहभागिता और जनसंवाद को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।

सवाल-जवाब के जरिए अधिकारियों ने साझा किए अनुभव

तकनीकी सत्र के अंत में संवादात्मक प्रश्नोत्तर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान अधिकारियों ने डिजिटल मीडिया के व्यावहारिक उपयोग, सूचनाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने, सोशल मीडिया पर सामग्री की पहुंच बढ़ाने और एल्गोरिदम आधारित वातावरण में आधिकारिक संदेशों को प्रभावी बनाने से संबंधित विषयों पर चर्चा की।

इस चर्चा ने अधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्र में सामने आने वाली चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर विचार करने का अवसर प्रदान किया।

कार्यक्रम में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक संजय कुमार बिस्वाल ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर आनंद प्रधान को सम्मानित किया। जनसंपर्क अधिकारी अंशुमान साहू और कृष्णकेशी बालियारसिंह ने सत्र के समन्वय की जिम्मेदारी निभाई।

जिम्मेदार डिजिटल संचार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

ओआईएस अधिकारियों के लिए आयोजित यह तकनीकी सत्र बदलते डिजिटल परिवेश में सरकारी संचार व्यवस्था को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा। इसमें आधुनिक तकनीक के उपयोग के साथ तथ्यात्मक शुद्धता, पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष ध्यान दिया गया।

आज के समय में सरकारी सूचना अधिकारियों के लिए तकनीकी दक्षता के साथ सही जानकारी की पहचान करना, उसे सरल भाषा में प्रस्तुत करना और भ्रामक सामग्री का जिम्मेदारी से मुकाबला करना आवश्यक है।

एआई और सोशल मीडिया भविष्य में सरकारी संचार को और अधिक व्यापक बना सकते हैं। लेकिन इन माध्यमों की वास्तविक उपयोगिता तभी सुनिश्चित होगी, जब उनका इस्तेमाल जनहित, विश्वसनीयता और जिम्मेदारी को केंद्र में रखकर किया जाएगा। यही दृष्टिकोण नागरिकों और प्रशासन के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने में सहायक बन सकता है।