न्यायिक जवाबदेही और लोकतंत्र की रक्षा: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का गंभीर सवाल

06 जून 2025 को उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने एक महत्वपूर्ण वक्तव्य देते हुए न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतंत्र की नींव पर गंभीर सवाल खड़े किए। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के वकीलों से बातचीत में उन्होंने उस घटनाक्रम पर चिंता जताई, जिसमें एक कार्यरत न्यायाधीश के आवास से बेहिसाब नकदी बरामद हुई थी। यह प्रकरण न केवल न्याय व्यवस्था की छवि को धूमिल करता है, बल्कि यह आमजन के विश्वास पर भी गहरी चोट है।
🔍 सरकार की विवशता और न्यायिक आदेश की बाधा
श्री धनखड़ ने कहा कि वर्तमान सरकार उस घटना में एफआईआर दर्ज करने में असमर्थ रही है, क्योंकि एक तीन दशक पुराना न्यायिक आदेश इसमें बाधा बन रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई अपराध हुआ है, तो उस पर कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है? उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कोई भी समिति जो न्यायाधीशों द्वारा गठित हो, एफआईआर या संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती।
🧾 क्या न्यायिक निर्णयों पर पड़ा है नकदी का प्रभाव?
उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि क्या न्याय के मंदिर में भी भ्रष्टाचार की घुसपैठ हो चुकी है? अगर हां, तो जनता किस पर विश्वास करेगी? उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका में यदि मनी ट्रेल और भ्रष्टाचार के संकेत मिलते हैं, तो वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है। किसी न्यायिक पदाधिकारी को हटाने का प्रस्ताव केवल अंतिम उपाय हो सकता है, परंतु प्रारंभिक कार्रवाई की अनदेखी नहीं की जा सकती।
⚖️ वकीलों की भूमिका और बार की जिम्मेदारी
श्री धनखड़ ने कहा कि बार एसोसिएशनों की भूमिका कानून के शासन की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि देशभर की बार परिषदें इस विषय को गंभीरता से ले रही हैं। उन्होंने आशा जताई कि एफआईआर जल्द से जल्द दर्ज की जाएगी, ताकि जनता का भरोसा बहाल हो सके।
🧭 लोकतंत्र के स्तंभों पर मंडराता संकट
उपराष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि यदि कुछ लोग कानून से ऊपर माने जाएंगे, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी। उन्होंने ‘सरवान सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1957’ का उदाहरण देते हुए बताया कि सत्य और अनुमान के बीच की रेखा केवल विश्वसनीय साक्ष्य से ही तय की जा सकती है। किसी को भी दोषी ठहराना पूर्वाग्रहपूर्ण नहीं होना चाहिए, लेकिन जांच की शुरुआत तो अवश्य होनी चाहिए।
🌍 वैश्विक दृष्टिकोण और भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा
अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभव साझा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय न्यायाधीशों की बुद्धिमत्ता और ईमानदारी पर आज भी दुनिया भरोसा करती है। जब कार्यपालिका पर से जनता का विश्वास डगमगाता है, तब न्यायपालिका ही अंतिम आशा का केंद्र बनती है। ऐसे में यदि वही संस्था भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरती है, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
निष्कर्ष:
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का यह बयान केवल एक व्यक्ति की चिंता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा की पुकार है। यह प्रकरण न्यायपालिका में जवाबदेही, पारदर्शिता और नैतिकता के महत्व को दोबारा रेखांकित करता है। निष्पक्ष जांच, संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन और जनता का विश्वास — यही इस संकट से निकलने का एकमात्र रास्ता है।
“न्याय जब बिकता है, तो लोकतंत्र रोता है। और जब न्याय बचता है, तो राष्ट्र खिलता है।”
