फ़रवरी 14, 2026

जिसमें छात्रवृत्ति पोर्टल के तीन वर्षों तक निष्क्रिय रहने और उससे वंचित छात्रों पर पड़े प्रभाव की चर्चा की गई है:

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Anoop singh

📰 बिहार में छात्रवृत्ति पोर्टल तीन वर्षों तक बंद रहा: लाखों वंचित छात्रों की उम्मीदों पर फिरा पानी

बिहार में सामाजिक न्याय और शैक्षिक समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति पोर्टल तीन वर्षों तक निष्क्रिय रहा, जिससे हजारों नहीं बल्कि लाखों छात्रों की शैक्षिक यात्रा पर गहरा असर पड़ा। विशेषकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र-छात्राएं इस तकनीकी और प्रशासनिक विफलता के शिकार बने।

📌 तकनीकी खामियों से बर्बाद हुए सपने

साल 2021-22 के दौरान जब छात्रवृत्तियां वितरित की जानी थीं, तब पोर्टल पूर्ण रूप से निष्क्रिय था। न कोई ऑनलाइन फॉर्म भर पाए, न कोई आवेदन प्रक्रिया पूरी हो सकी। इसके चलते राज्य सरकार की ओर से उस शैक्षणिक सत्र में एक भी छात्र को छात्रवृत्ति नहीं दी गई। यह केवल एक तकनीकी चूक नहीं थी, बल्कि इससे हजारों छात्र पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो गए।

📉 छात्रवृत्तियों में आई गिरावट

बिहार सरकार की रिपोर्टों के अनुसार, जहां 2022-23 में 1.36 लाख छात्रों को छात्रवृत्ति मिली थी, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर मात्र 69 हजार रह गई। यह गिरावट न केवल प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सरकार अब तक इस विफलता की भरपाई करने में विफल रही है।

🏫 आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की परेशानी

छात्रवृत्तियां उन छात्रों के लिए जीवनरेखा होती हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते। बिहार जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी ग्रामीण और वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां छात्रवृत्तियों का समय पर वितरण अत्यंत आवश्यक है। परंतु इस पोर्टल विफलता ने ना केवल उनकी पढ़ाई पर असर डाला, बल्कि आत्मविश्वास भी तोड़ा।

📣 राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इस मुद्दे को लेकर विपक्षी नेताओं ने सरकार की आलोचना की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर वंचित छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए पारदर्शी, समयबद्ध और निष्पक्ष छात्रवृत्ति वितरण प्रणाली की मांग की। उन्होंने दरभंगा के अंबेडकर छात्रावास का उदाहरण देते हुए छात्रों की दुर्दशा को उजागर किया।

✅ क्या होना चाहिए आगे?

  • राज्य सरकार को चाहिए कि वह पोर्टल की तकनीकी खामियों को तत्काल दूर करे।
  • बीते वर्षों में छात्रवृत्ति से वंचित छात्रों को मुआवज़ा स्वरूप विशेष अनुदान या पिछला बकाया तत्काल प्रदान किया जाए।
  • एक स्वतंत्र जांच समिति गठित हो जो इस विफलता की जिम्मेदारी तय करे।
  • हर जिले में छात्रवृत्ति सहायता केंद्रों की स्थापना की जाए, जहां छात्रों को आवेदन और फॉलो-अप की मदद मिले।

🔚 निष्कर्ष:

छात्रवृत्ति केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि समान अवसर और सामाजिक न्याय का माध्यम है। यदि ऐसी योजनाएं तकनीकी और प्रशासनिक उपेक्षा की भेंट चढ़ती हैं, तो समाज का सबसे कमजोर वर्ग शिक्षा से वंचित रह जाएगा। बिहार में तीन साल तक छात्रवृत्ति पोर्टल का निष्क्रिय रहना इस बात का प्रतीक है कि योजनाओं की घोषणा से अधिक ज़रूरी है उनके क्रियान्वयन की ईमानदार निगरानी।

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