बाराबंकी लाठीचार्ज: लोकतंत्र की आवाज़ पर डंडों की चोट?

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा प्राप्त करने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले युवाओं को यदि पुलिस के डंडों से चुप कराया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
📌 घटना का विवरण
2 सितंबर 2022 को बाराबंकी में छात्र अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे। प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन अचानक पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया। लाठीचार्ज का वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर आक्रोश फैल गया और विपक्षी दलों ने सरकार पर “तानाशाही रवैये” का आरोप लगाया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने टिप्पणी की कि यह घटना सरकार की नाकामी और युवाओं की आवाज़ को दबाने का प्रतीक है।
🔎 मूलभूत प्रश्न
- क्या युवाओं को अपना पक्ष रखने का अधिकार नहीं है?
- क्या प्रशासनिक असफलता को छुपाने का तरीका केवल बल प्रयोग है?
- क्या यह लोकतांत्रिक मूल्यों और छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है?
🧭 राजनीति और जनता की प्रतिक्रिया
घटना के बाद विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी और छात्रों पर हुए हमले को “भविष्य के सपनों पर हमला” करार दिया। सरकार की ओर से कोई ठोस बयान सामने नहीं आया, जिससे असंतोष और गहरा गया। आम नागरिकों, विशेषकर युवाओं के अभिभावकों में, इस कार्रवाई को लेकर निराशा और गुस्सा साफ देखा गया।
🏛️ लोकतंत्र और दमन की टकराहट
छात्र किसी भी राष्ट्र के निर्माण की नींव होते हैं। यदि उनकी आवाज को डंडों से कुचला जाएगा, तो यह न केवल लोकतंत्र के लिए खतरा है बल्कि समाज की प्रगतिशील सोच पर भी चोट है। लोकतंत्र संवाद पर टिका होता है, डर और दमन पर नहीं।
✍️ निष्कर्ष
बाराबंकी की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या शासन ने संवाद और समाधान की राह छोड़ दी है? अगर सरकार युवाओं की समस्याओं को सुनने के बजाय उन्हें चुप कराने की कोशिश करेगी, तो विश्वास की डोर कमजोर होगी।
सच्चा लोकतंत्र वह है जहाँ लाठी नहीं, नीति बोलती है; डर नहीं, संवाद आगे बढ़ता है।
