भाजपा की जीएसटी नीति: दिखावे की कटौती और बढ़ती व्यापारी संकट

प्रस्तावना
भारतीय राजनीति में जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) हमेशा से ही बहस का केंद्र रहा है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि सरकार इसकी आड़ में व्यापारियों और आम जनता को गुमराह कर रही है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बयान में कहा कि भाजपा सरकार ने तैयार माल पर जीएसटी घटाकर “सस्ता माल” दिखाने का प्रयास किया है, लेकिन कच्चे माल पर टैक्स बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप व्यापारी वर्ग दोहरी मार झेल रहा है और उपभोक्ताओं को भी इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
तैयार माल पर दिखावे की कटौती
भाजपा सरकार ने तैयार उत्पादों पर जीएसटी में कटौती की घोषणा कर जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब सामान पहले से सस्ता मिलेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि कच्चे माल पर कर बढ़ा दिए गए हैं। जब उत्पादन की मूल लागत ही बढ़ जाएगी, तो दुकानदार कैसे सस्ता सामान बेच पाएंगे? यही वह विरोधाभास है जो जनता को दिखाई नहीं देता, लेकिन व्यापारी गहराई से महसूस करते हैं।
व्यापारी वर्ग की दुश्वारियां
व्यापारियों का कहना है कि वे पहले ही मंदी, महंगाई और प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं। अब कच्चे माल पर बढ़े हुए टैक्स ने उनका मुनाफा लगभग खत्म कर दिया है। दुकानदारों को ग्राहकों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है कि “सामान सस्ता क्यों नहीं हुआ?” यह स्थिति ग्राहक और दुकानदार के बीच अनावश्यक तनाव पैदा कर रही है।
जनता की गलतफहमी और वास्तविकता
भाजपा के कार्यकर्ता और नेता जब सड़कों पर “50% सस्ता” जैसे नारे लगाते हैं, तो जनता को लगता है कि बाजार में सबकुछ आधे दाम पर मिलेगा। लेकिन जब वे दुकानों पर जाते हैं और कीमतों में कोई खास बदलाव नहीं देखते, तो उनकी नाराज़गी दुकानदारों पर निकलती है। इस गलतफहमी का खामियाज़ा व्यापारी भुगत रहे हैं, जबकि असली कारण सरकार की कर-नीति है।
सुधार या अव्यवस्था?
सरकार इसे “सुधार” कह रही है, लेकिन असल में यह नीति न तो उपभोक्ता हित में है और न ही व्यापारी हित में। यदि जीएसटी संरचना पारदर्शी और संतुलित नहीं होगी, तो यह न केवल व्यापार को प्रभावित करेगी बल्कि ग्राहक और दुकानदार के बीच के भरोसे को भी कमजोर करेगी।
निष्कर्ष
अखिलेश यादव का यह बयान व्यापारियों और आम जनता की पीड़ा को सामने लाता है। भाजपा की जीएसटी नीति सतही रूप से “सस्ती कीमतों” का भ्रम पैदा करती है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह व्यापार जगत को संकट में डाल रही है। सुधार के नाम पर यदि अव्यवस्था ही फैलाई जाएगी, तो अंततः नुकसान देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता दोनों को होगा।
👉 सार यह है कि जीएसटी जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के बजाय वास्तविक आर्थिक राहत देने के लिए होना चाहिए।
