ख़ामोशी बनाम ज़िम्मेदारी: भारतीय राजनीति के बदलते संकेत

भारतीय लोकतंत्र हमेशा संवाद, असहमति और प्रश्नों पर टिका रहा है। लेकिन हालिया राजनीतिक माहौल में एक नई प्रवृत्ति तेज़ी से उभरती दिखाई दे रही है—ख़ामोशी को नीति बना लेना। इसी संदर्भ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक ट्वीट के ज़रिए सत्ता पक्ष की रणनीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जो केवल एक दल नहीं, बल्कि समूची राजनीतिक संस्कृति पर टिप्पणी बनकर उभरा है।
मौन सत्ता की ढाल या जवाबदेही से दूरी?
अखिलेश यादव का संकेत साफ़ है कि जब निर्णय बंद कमरों में लिए जाएँ, कैबिनेट जैसे महत्वपूर्ण ढाँचों में बदलाव बिना सार्वजनिक संवाद के हों और असहमति की आवाज़ों को अनसुना कर दिया जाए, तब चुप्पी शक्ति नहीं बल्कि असहजता का संकेत बन जाती है। लोकतंत्र में मौन तभी अर्थपूर्ण होता है, जब वह आत्ममंथन का परिणाम हो—अन्यथा वह जवाबदेही से बचाव का तरीका बन जाता है।
समाज मूल है, राजनीति उसका प्रतिबिंब
अपने वक्तव्य में अखिलेश यादव ने यह रेखांकित किया कि राजनीति समाज की उपज है, कोई अलग सत्ता-संरचना नहीं। जब राजनीति स्वयं को समाज से ऊपर समझने लगती है, तब टकराव स्वाभाविक हो जाता है। लोकतंत्र की सेहत इसी पर निर्भर करती है कि शासन जनता की संवेदना, विविधता और सम्मान को कितनी प्राथमिकता देता है।
चेतावनी की भाषा और सामाजिक संतुलन
हाल के समय में कुछ ऐसे बयान और घटनाएँ सामने आई हैं, जिनमें समुदाय विशेष को लक्षित कर सार्वजनिक रूप से चेताने की प्रवृत्ति दिखी। यह रवैया केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के ताने-बाने को प्रभावित करता है। अखिलेश यादव ने इसे एक खतरनाक संकेत बताया—जहाँ राजनीति संवाद छोड़कर दबाव की भाषा अपनाने लगती है।
सम्मान: आदेश से नहीं, आचरण से
राजनीतिक सम्मान किसी पद, बहुमत या सत्ता से स्वतः नहीं मिलता। वह जनता के प्रति व्यवहार, पारदर्शिता और संवेदनशील फैसलों से अर्जित होता है। अखिलेश यादव का संदेश स्पष्ट है कि सम्मान थोपकर नहीं पाया जा सकता; वह तभी मिलता है जब सत्ता जनता को सुनने और समझने की इच्छाशक्ति दिखाए।
निष्कर्ष: लोकतंत्र को फिर संवाद चाहिए
अखिलेश यादव का वक्तव्य महज़ सियासी टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उस भावना को दर्शाता है, जिसमें लोग सत्ता की चुप्पी नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वपूर्ण संवाद चाहते हैं। भारतीय राजनीति के लिए यह समय आत्मविश्लेषण का है—क्या मौन से सम्मान आएगा, या सम्मान के लिए फिर से जनता की आवाज़ को केंद्र में लाना होगा?
