मनरेगा के इर्द-गिर्द राजनीति: खड़गे बनाम केंद्र सरकार

देश में ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र की मोदी सरकार पर सीधे निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि वर्तमान नीतियाँ गरीबों के हक पर कुठाराघात कर रही हैं। कर्नाटक के कलबुर्गी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए खड़गे ने कहा कि सरकार के मौजूदा फैसले आने वाले समय में भारी सामाजिक कीमत वसूल सकते हैं।
रोज़गार की गारंटी या व्यवस्था पर बोझ?
मनरेगा को वर्ष 2005 में ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और पलायन की समस्या से निपटने के लिए लागू किया गया था। इस योजना के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सालाना 100 दिन का सुनिश्चित रोज़गार देने का प्रावधान है। खड़गे का कहना है कि यह योजना केवल आमदनी का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उनके अनुसार, मनरेगा के तहत बनाए गए जल संरक्षण ढांचे, सड़कें और अन्य परिसंपत्तियाँ लंबे समय तक गांवों को लाभ पहुंचाती हैं, जिसकी पुष्टि कई सरकारी ऑडिट रिपोर्टें भी करती हैं।
केंद्र पर सवाल: नीति में बदलाव या योजना को कमजोर करने की कोशिश?
कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा नियमों में किए गए बदलावों से राज्यों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाला जा रहा है। उनका कहना है कि भुगतान में देरी, बजट आवंटन में कटौती और जटिल प्रक्रियाओं के जरिए योजना को धीरे-धीरे निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। खड़गे ने यह भी कहा कि यदि सरकार को मनरेगा की कार्यप्रणाली पर संदेह है, तो समाधान पारदर्शी समीक्षा और सुधार में है, न कि इसे खत्म करने की ओर बढ़ने में।
आस्था बनाम मुद्दों की राजनीति
खड़गे ने प्रधानमंत्री की धार्मिक कार्यक्रमों से जुड़ी सार्वजनिक गतिविधियों पर भी टिप्पणी की। उनका आरोप है कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए धार्मिक विमर्श को प्रमुख मुद्दों से ऊपर रखा जा रहा है। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे रोज़गार, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे वास्तविक सवालों पर ध्यान केंद्रित करें और भावनात्मक राजनीति से सावधान रहें।
‘मनरेगा बचाओ संग्राम’: कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी पहल
मनरेगा से जुड़े विवादों के बीच कांग्रेस ने ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ नाम से एक देशव्यापी आंदोलन शुरू किया है। यह अभियान 10 जनवरी से 25 फरवरी तक प्रस्तावित है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण समुदायों को जागरूक करना और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ जन-दबाव बनाना है। खड़गे के अनुसार, यह संघर्ष केवल एक सरकारी योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गरीबों के संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा की रक्षा से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष
मनरेगा को लेकर चल रही बहस यह दर्शाती है कि देश में विकास की दिशा और प्राथमिकताओं पर राजनीतिक मतभेद गहरे होते जा रहे हैं। एक ओर सरकार इसे नीति सुधार की आवश्यकता बताती है, वहीं विपक्ष इसे सामाजिक सुरक्षा पर हमला मान रहा है। आने वाले महीनों में यह मुद्दा न केवल संसद, बल्कि सड़क से लेकर चुनावी मंचों तक गूंजता दिखाई दे सकता है।
