फ़रवरी 12, 2026

किसान-मज़दूर आंदोलनों की दस्तक: नीतियों और लोकतंत्र के बीच संतुलन की चुनौती

0

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप तभी दिखाई देता है जब आम नागरिक अपनी आशंकाओं और अपेक्षाओं को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करते हैं। हाल के किसान और मज़दूर आंदोलनों ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि विकास संबंधी नीतियों और ज़मीनी वास्तविकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना कितना आवश्यक है। ये आंदोलन केवल मांगों का प्रस्तुतीकरण नहीं हैं, बल्कि शासन और समाज के बीच विश्वास की परीक्षा भी हैं।

श्रम सुधारों पर उठते प्रश्न

नई श्रम संहिताओं का उद्देश्य प्रशासनिक ढांचे को सरल बनाना और औद्योगिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना बताया गया है। किंतु श्रमिक संगठनों के भीतर यह धारणा प्रबल है कि इन परिवर्तनों से उनके अधिकारों की संरचना प्रभावित हो सकती है। उन्हें चिंता है कि कार्य अवधि, अनुबंध व्यवस्था और संगठनात्मक स्वतंत्रता जैसे पहलुओं में बदलाव से श्रमिक सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। यदि श्रम बाजार में संतुलन बिगड़ता है, तो इसका प्रभाव केवल मजदूरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और जीवनस्तर पर भी पड़ेगा।

वैश्विक व्यापार और कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता

दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की आहट को लेकर सतर्क है। मुक्त व्यापार समझौतों के संदर्भ में किसानों की आशंका यह है कि वैश्विक बाजार के दबाव से उनकी उपज का मूल्य घट सकता है। भारत का कृषि ढांचा अभी भी छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है; ऐसे में बाहरी प्रतिस्पर्धा यदि बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के आती है, तो ग्रामीण आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह केवल आर्थिक मामला नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण स्थायित्व से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

ग्रामीण रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न

ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार गारंटी कार्यक्रमों ने न्यूनतम आय सुरक्षा का आधार प्रदान किया है। ऐसे कार्यक्रमों की प्रासंगिकता केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण और स्थानीय मांग को बनाए रखने से भी जुड़ी है। यदि इन योजनाओं के दायरे या संसाधनों में कमी आती है, तो इसका असर ग्रामीण अर्थचक्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। अतः सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मज़बूत बनाए रखना आवश्यक है।

संवाद बनाम निर्णय प्रक्रिया

किसान और मज़दूर आंदोलनों का मूल संदेश यही है कि नीति-निर्माण में सहभागिता अनिवार्य है। जब निर्णय सीधे प्रभावित समूहों से पर्याप्त संवाद के बिना लिए जाते हैं, तो अविश्वास की भावना जन्म लेती है। लोकतंत्र की शक्ति केवल बहुमत में नहीं, बल्कि संवाद और सहमति के निर्माण में निहित है। यदि सरकार और हितधारक संगठनों के बीच पारदर्शी वार्ता स्थापित हो, तो समाधान अधिक टिकाऊ और स्वीकार्य हो सकते हैं।

समापन विचार

वर्तमान परिस्थितियाँ हमें यह सिखाती हैं कि आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। किसान और मज़दूर आंदोलनों की आवाज़ विकास विरोध नहीं, बल्कि संतुलित और समावेशी नीतियों की मांग है। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि असहमति को अवसर में बदला जाए और संवाद के माध्यम से ऐसी राह निकाली जाए, जहाँ विकास के साथ गरिमा और अधिकार भी सुरक्षित रहें।


प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

इन्हे भी देखें