सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली: शिक्षा मूल्यांकन में डिजिटल परिवर्तन की दिशा

भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने वर्ष 2026 से कक्षा 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया है। यह पहल केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और विश्वसनीय बनाने की एक संगठित कोशिश है।
क्या है ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली?
ऑन-स्क्रीन मार्किंग एक डिजिटल मूल्यांकन पद्धति है। इसके अंतर्गत परीक्षार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं को पहले स्कैन किया जाएगा और फिर उन्हें एक सुरक्षित ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किया जाएगा। मूल्यांकनकर्ता शिक्षक इन स्कैन की गई प्रतियों को अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर देखेंगे और वहीं सीधे अंक दर्ज करेंगे।
इस प्रणाली की विशेषता यह है कि अंक जोड़ने या गणना की प्रक्रिया सॉफ़्टवेयर द्वारा स्वतः की जाती है, जिससे जोड़-घटाव की त्रुटि की संभावना समाप्त हो जाती है।
परिवर्तन की आवश्यकता क्यों?
हर वर्ष लाखों विद्यार्थी सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं में शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में लगभग 46 लाख विद्यार्थियों के परीक्षा देने की संभावना है और परीक्षा 8074 केंद्रों पर आयोजित की जाएगी। इतनी बड़ी संख्या में उत्तर पुस्तिकाओं का पारंपरिक ढंग से मूल्यांकन समयसाध्य और जटिल प्रक्रिया होती है।
पूर्व में कई बार अंक जोड़ने में त्रुटियों या विलंब जैसी समस्याएँ सामने आई हैं। ऐसे में डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली इन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती है।
इस पहल के प्रमुख लाभ
1. निष्पक्षता और पारदर्शिता में वृद्धि
डिजिटल प्रणाली के कारण अंक जोड़ने की त्रुटि समाप्त होगी। साथ ही मूल्यांकन की निगरानी भी अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकेगी।
2. परिणामों की शीघ्र घोषणा
एक साथ बड़ी संख्या में परीक्षक ऑनलाइन मूल्यांकन कर सकेंगे, जिससे परिणाम जारी करने में लगने वाला समय कम होगा।
3. शिक्षकों के लिए सुविधा
शिक्षक अपने विद्यालय या निर्धारित केंद्र से ही लॉगिन कर मूल्यांकन कर सकेंगे। इससे यात्रा, समय और संसाधनों की बचत होगी।
4. बेहतर जवाबदेही और ट्रैकिंग
सिस्टम में प्रत्येक मूल्यांकनकर्ता की गतिविधि दर्ज रहेगी, जिससे पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ेगा।
संभावित चुनौतियाँ
हालाँकि यह पहल सराहनीय है, फिर भी इसके साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं:
- डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की तकनीकी स्थिरता और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- सभी मूल्यांकनकर्ताओं को पर्याप्त प्रशिक्षण प्रदान करना।
- ग्रामीण या दूरस्थ क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी से जुड़ी समस्याएँ।
- प्रारंभिक चरण में तकनीकी गड़बड़ियों का जोखिम।
यदि इन चुनौतियों को योजनाबद्ध तरीके से संबोधित किया जाए, तो यह प्रणाली दीर्घकाल में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकती है।
कक्षा 10वीं के लिए पारंपरिक प्रणाली
ध्यान देने योग्य बात यह है कि फिलहाल कक्षा 10वीं की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन पारंपरिक पद्धति से ही किया जाएगा। संभव है कि 12वीं में सफल क्रियान्वयन के बाद भविष्य में इसे अन्य कक्षाओं में भी लागू किया जाए।
दीर्घकालिक प्रभाव
ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली भारतीय शिक्षा व्यवस्था में डिजिटल एकीकरण को गति दे सकती है। इससे भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया पूर्णतः डेटा-आधारित और व्यवस्थित हो सकती है। परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ेगी और विद्यार्थियों का बोर्ड परीक्षा प्रणाली पर विश्वास और मजबूत होगा।
साथ ही यह कदम डिजिटल इंडिया अभियान के अनुरूप शिक्षा क्षेत्र में तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करता है। आने वाले समय में संभव है कि मूल्यांकन के अतिरिक्त अन्य प्रक्रियाएँ—जैसे प्रश्नपत्र निर्माण, मॉडरेशन और विश्लेषण—भी पूरी तरह डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर स्थानांतरित हो जाएँ।
निष्कर्ष
सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली शिक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम है। यदि इसे प्रभावी प्रशिक्षण, मज़बूत तकनीकी ढाँचे और पारदर्शी संचालन के साथ लागू किया गया, तो यह भारतीय बोर्ड परीक्षाओं की प्रकृति को स्थायी रूप से बदल सकता है।
