स्वास्थ्य व्यवस्था पर राजनीति बनाम ज़मीनी हकीकत: उत्तर प्रदेश के संदर्भ में एक विश्लेषण

उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रही है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। उनका कहना है कि पूर्ववर्ती सरकार में बने मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की उपेक्षा की जा रही है, कई संस्थान स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं और स्वास्थ्य सेवाएँ अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पा रही हैं। इस संदर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि हम स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और आम जनता पर उसके प्रभाव का संतुलित विश्लेषण करें।
मेडिकल कॉलेज और अस्पताल: इमारत बनाम संचालन
किसी भी राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इमारतों की संख्या से नहीं किया जा सकता। मेडिकल कॉलेज बनाना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है—उचित डॉक्टरों की नियुक्ति, नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता, आधुनिक उपकरण, दवाओं की आपूर्ति और प्रशासनिक दक्षता। यदि भवन खड़े हो जाएँ लेकिन उनमें पर्याप्त संसाधन और मानवबल न हो, तो उनका लाभ जनता तक नहीं पहुंच पाता।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल आबादी वाले राज्य में हर जिले में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाना बड़ी चुनौती है। इसलिए नए मेडिकल कॉलेज खोलने के साथ-साथ उनके संचालन को सुदृढ़ करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
स्टाफ की कमी और प्रशासनिक चुनौतियाँ
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी वर्षों से एक प्रमुख समस्या रही है। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती विशेष रूप से कठिन रहती है। इसके पीछे कई कारण हैं—सुविधाओं की कमी, संसाधनों का असमान वितरण, और कभी-कभी प्रशासनिक निर्णयों में देरी।
यदि वास्तव में अस्पतालों में स्टाफ की कमी है, तो यह केवल किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि दीर्घकालीन नीति और क्रियान्वयन की समस्या है। स्वास्थ्य विभाग में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध नियुक्तियाँ इस समस्या के समाधान का प्रमुख आधार हो सकती हैं।
राजनीतिक आरोप और जनहित
राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप सामान्य बात है, विशेषकर जब बात बुनियादी सेवाओं की हो। परंतु स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीति से अधिक समाधान की अपेक्षा की जाती है। जनता के लिए यह मायने नहीं रखता कि किस दल ने अस्पताल बनाया और किसने उसे संचालित किया; उनके लिए महत्वपूर्ण है कि उन्हें समय पर उपचार मिले, दवाएँ उपलब्ध हों और डॉक्टर उपस्थित रहें।
यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही, भ्रष्टाचार या कुप्रबंधन की शिकायतें हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच और सुधारात्मक कदम आवश्यक हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय और विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए तकनीक का उपयोग, डिजिटल मॉनिटरिंग और सामाजिक लेखा-जोखा जैसे उपाय कारगर साबित हो सकते हैं।
आयुष और आधुनिक चिकित्सा के बीच संतुलन
हाल के वर्षों में आयुष क्षेत्र को भी बढ़ावा मिला है। आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ भारतीय संस्कृति का हिस्सा हैं और उनकी अपनी उपयोगिता है। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि एलोपैथिक अस्पतालों और ट्रॉमा सेंटरों की अनदेखी न हो। गंभीर बीमारियों और आपात स्थितियों के लिए आधुनिक चिकित्सा संरचना का मजबूत होना अनिवार्य है।
एक संतुलित स्वास्थ्य नीति वह होगी जो आयुष और एलोपैथी दोनों को उचित संसाधन और प्राथमिकता दे, ताकि जनता को बहुआयामी और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें।
आगे की राह
स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार केवल बजट बढ़ाने से नहीं होगा, बल्कि बेहतर प्रबंधन, ईमानदार कार्यान्वयन और निरंतर मूल्यांकन से संभव है। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे:
- खाली पदों पर शीघ्र नियुक्ति करें।
- मेडिकल कॉलेजों को स्वायत्त और जवाबदेह बनाएं।
- जिला अस्पतालों को आधुनिक उपकरणों से लैस करें।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएँ बेहतर करें।
- भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर कड़ी कार्रवाई करें।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। राजनीतिक बयानबाजी के बीच सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है—जनता का स्वास्थ्य और उसका विश्वास। किसी भी सरकार की असली परीक्षा इसी कसौटी पर होती है कि वह नागरिकों को सुरक्षित, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएँ दे सके।
स्वास्थ्य व्यवस्था को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विषय बनाने के बजाय उसे सहयोग और सुधार की दिशा में आगे बढ़ाना समय की मांग है। जब नीति, नियत और निष्पादन तीनों एक साथ मिलेंगे, तभी प्रदेश में सच्चे अर्थों में ‘स्वस्थ उत्तर प्रदेश’ का निर्माण संभव हो सकेगा।
