फ़रवरी 14, 2026

वैश्विक वित्तीय प्रणाली का पुनर्गठन: साझा विकास की ओर एक निर्णायक कदम

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Anoop singh

28 जून 2025

संयुक्त राष्ट्र का हालिया वक्तव्य — “वैश्विक वित्तीय प्रणालियों को विकासशील देशों के लिए काम करना चाहिए, न कि उनके खिलाफ” — एक लंबे समय से उपेक्षित वैश्विक मुद्दे को केंद्र में लाता है। जैसे-जैसे आगामी “Conference on Financing for Development” का मंच तैयार हो रहा है, यह समय है कि हम एक ऐसी वित्तीय प्रणाली की कल्पना करें जो सभी राष्ट्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके — विशेष रूप से उन देशों की जो अब भी विकास की चुनौतीपूर्ण राह पर हैं।

असमानताओं से ग्रस्त प्रणाली

वर्तमान वैश्विक वित्तीय ढांचा वर्षों से आलोचनाओं के घेरे में रहा है। विकासशील देशों को अक्सर अत्यधिक ऋण भार, उच्च ब्याज दरों पर सीमित वित्तीय पहुंच, और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये बाधाएँ उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचा और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश करने से रोकती हैं।

समाधान: न्यायसंगत और समावेशी वित्त

इस असंतुलन को दूर करने के लिए एक नवाचार आधारित, न्यायसंगत और पारदर्शी वित्तीय प्रणाली की आवश्यकता है। कुछ प्रमुख सुधारात्मक कदमों में शामिल हैं:

  • वैश्विक ऋण नीतियों का पुनर्गठन
  • ज़रूरतमंद देशों के लिए ऋण राहत
  • जलवायु वित्त के लिए निष्पक्ष और प्रभावशाली तंत्र
  • विकासशील देशों के लिए राजकोषीय स्थान (fiscal space) का विस्तार
  • पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा

निजी क्षेत्र और तकनीक की भूमिका

सरकारों के साथ-साथ निजी क्षेत्र को भी विकास लक्ष्यों में भागीदारी करनी होगी। इसके अलावा, तकनीक और नवाचार को सभी के लिए सुलभ बनाना बेहद ज़रूरी है, ताकि विकासशील राष्ट्र भी डिजिटल अर्थव्यवस्था और हरित निवेश में भाग ले सकें।

आर्थिक झटकों से सुरक्षा और वैश्विक सहयोग

एक “लोगों और पृथ्वी” केंद्रित वित्तीय दृष्टिकोण अपनाना अब अपरिहार्य है। कमजोर देशों को वैश्विक आर्थिक झटकों से बचाना और सतत विकास के प्रयासों में सहयोग देना एक साझा ज़िम्मेदारी है। संयुक्त राष्ट्र का आगामी सम्मेलन इस दिशा में निर्णायक रणनीतियों को आकार देने का मंच साबित हो सकता है।


निष्कर्ष

जब तक वैश्विक वित्तीय प्रणाली को समावेशी और न्यायसंगत नहीं बनाया जाएगा, तब तक “साझा विकास” केवल एक नारा बना रहेगा। अब समय आ गया है कि दुनिया सामूहिक रूप से ऐसी नीतियाँ अपनाए जो हर राष्ट्र की प्रगति सुनिश्चित करें और किसी को भी पीछे न छोड़ें।


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