फ़रवरी 12, 2026

सपनों में मृत परिजनों का आना: प्रेमानंद महाराज की दृष्टि से एक आध्यात्मिक समझ

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Anoop singh

मानव मन वर्षों से इस प्रश्न को लेकर जिज्ञासु रहा है कि जब कोई मृत आत्मा या भूत-प्रेत हमारे सपनों में दिखाई देता है, तो उसका क्या अर्थ होता है? यह विषय रहस्य, भय और भावनाओं से जुड़ा हुआ है। वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत पूज्य प्रेमानंद महाराज इस विषय पर अपनी आध्यात्मिक व्याख्या के लिए जाने जाते हैं। अपने प्रवचनों में वे बार-बार लोगों की इस शंका को विस्तार से समझाते हैं।

हाल ही में एक भक्त ने महाराज श्री से पूछा कि अगर स्वर्गवासी परिजन सपने में दिखाई दें, तो क्या इसे किसी संकट का संकेत मानना चाहिए? प्रेमानंद महाराज का उत्तर न केवल शांति देने वाला था, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी गहन था।

उन्होंने सपनों को तीन प्रकारों में बाँटा:

1. मृत परिजनों या संबंधियों के दर्शन

2. ईश्वर अथवा साधु-संतों के दर्शन

3. साधारण कल्पना से उत्पन्न भ्रमात्मक सपने

महाराज जी ने बताया कि हर व्यक्ति का मन उन लोगों से भी जुड़ा होता है जो अब इस संसार में नहीं हैं। जब मृत परिजन हमारे स्वप्न में आते हैं, तो यह मन की भावनात्मक स्मृति होती है, न कि किसी बुरे संकेत का सूचक। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे डर या चिंता का कारण नहीं बनाना चाहिए।

तो फिर समाधान क्या है?
महाराज जी का मानना है कि यदि ऐसा सपना आए, तो श्रद्धा से दान-पुण्य करना चाहिए। जल, अन्न या वस्त्र का दान करना एक शुभ कार्य है, जो न केवल पूर्वजों को शांति देता है, बल्कि हमारे भीतर करुणा और सेवा का भाव भी जाग्रत करता है।

उन्होंने बताया कि यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में पिंडदान और श्राद्ध कर्म की परंपरा बनाई गई है। जब तक माता-पिता या परिवार के बुजुर्ग जीवित हों, उनकी सेवा करनी चाहिए, और उनके देहत्याग के बाद उनकी स्मृति में परोपकार और पुण्य का मार्ग अपनाना चाहिए।

इस परंपरा का उद्देश्य केवल मृतकों के प्रति सम्मान नहीं है, बल्कि यह जीवितों को भी अपने कर्तव्यों और कर्म की गहराई से पहचान कराता है। यही सोच हमें नकारात्मकता से दूर रखती है और जीवन को सकारात्मक दिशा देती है।

निष्कर्षतः, प्रेमानंद महाराज का संदेश यह है कि मृत आत्माओं के सपनों में आने को लेकर घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह हमारे मन की भावनात्मक गहराई का प्रतिबिंब है। ऐसे में हमें श्रद्धा, सेवा और दान के माध्यम से आत्मिक शांति की ओर अग्रसर होना चाहिए।

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