“धीरेंद्र शास्त्री की कथा बुलाना – क्या यह हर किसी के बस की बात है?”

लखनऊ, जून 2025 — भारत में अध्यात्म और धार्मिक आयोजनों का अपना एक विशेष स्थान है, लेकिन हाल ही में एक बयान ने इस पर नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कथावाचकों की बढ़ती लोकप्रियता और उनकी कथाओं में खर्च हो रहे भारी-भरकम पैसों को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र शास्त्री का नाम लेते हुए कहा – “बताइए, किसकी हैसियत है कि धीरेंद्र शास्त्री को अपने घर कथा के लिए बुला सके?”
यह बयान न केवल मीडिया की सुर्खियाँ बन गया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी व्यापक रूप से चर्चा का विषय बन गया।
📖 कौन हैं धीरेंद्र शास्त्री?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें लोग “बागेश्वर धाम सरकार” के नाम से भी जानते हैं, मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बागेश्वर धाम से जुड़े हैं। वे एक लोकप्रिय सनातन धर्म प्रवक्ता और कथावाचक हैं, जो अपने चमत्कारी ‘दरबार’ और ‘गुप्त ज्ञान’ के लिए प्रसिद्ध हुए हैं। लाखों लोग उनकी कथाओं में भाग लेते हैं, और सोशल मीडिया पर उनके कार्यक्रमों के वीडियो लाखों बार देखे जाते हैं।
💰 कथा बुलाना – भावना या हैसियत की बात?
भारत में धार्मिक आयोजन सदियों से श्रद्धा का विषय रहे हैं, लेकिन जब बात नामी कथावाचकों की आती है, तो आयोजन अब सिर्फ श्रद्धा नहीं, हैसियत का प्रतीक बनता जा रहा है। बताया जाता है कि धीरेंद्र शास्त्री जैसे कथावाचकों की एक कथा के आयोजन में लाखों, बल्कि कभी-कभी करोड़ों रुपये तक खर्च हो सकते हैं — इसमें पंडाल, सुरक्षा, प्रसाद, व्यवस्था, और आयोजकों की भेंट राशि शामिल होती है।
🗣️ अखिलेश यादव की टिप्पणी का निहितार्थ
अखिलेश यादव का यह बयान केवल आर्थिक आलोचना नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक असमानता और बदलती धार्मिक संस्कृति की चिंता भी झलकती है। वे कहना चाहते हैं कि आज धार्मिक आयोजनों में सामान्य लोगों की भागीदारी कम होती जा रही है क्योंकि वे इन आयोजनों के खर्च उठाने में असमर्थ हैं।
🔥 जनता की प्रतिक्रिया
कुछ लोग अखिलेश यादव के इस बयान को तर्कसंगत मानते हैं। उनका कहना है कि धर्म का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और समाज का कल्याण होना चाहिए। वहीं, शास्त्री जी के समर्थक इसे एक राजनीतिक हमला मानते हैं और कहते हैं कि श्रद्धा की कोई कीमत नहीं होती — लोग स्वेच्छा से आयोजन करते हैं।
🧠 समाज के लिए क्या संदेश?
यह विवाद एक बड़ा सवाल उठाता है — क्या धर्म अब आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन बन गया है? क्या गरीब और मध्यम वर्ग केवल दर्शक बनकर रह गया है? और क्या कथावाचन अब समाज सुधार की जगह एक महंगा इवेंट बनता जा रहा है?
निष्कर्ष:
धीरेंद्र शास्त्री जैसे कथावाचकों की लोकप्रियता निर्विवाद है, लेकिन उनके कार्यक्रमों की भव्यता और खर्च अब एक सामाजिक विमर्श का विषय बन गई है। अखिलेश यादव का बयान उस जनता की आवाज को सामने लाता है जो केवल श्रद्धा नहीं, समानता और सहजता की उम्मीद करती है। धर्म को विशुद्ध और सर्वसुलभ बनाए रखना अब केवल संतों की नहीं, समाज और व्यवस्था की भी जिम्मेदारी है।
