लोकतंत्र के प्रहरी: संसदें और सतत विकास की दिशा में उनका बढ़ता महत्व

हर वर्ष 30 जून को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संसदवाद दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आत्मा—संसदों—की भूमिका को सम्मान देने का अवसर है। आज जब पूरी दुनिया सतत विकास और सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, संसदें उस यात्रा की दिशा तय करने वाले अहम स्तंभ बनकर उभरी हैं।
संसदें केवल कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र के विवेक, विचार और विविधता की असली आवाज होती हैं। यहां न केवल विधायी प्रक्रिया चलती है, बल्कि आम नागरिक की समस्याओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व होता है। सांसद जनता और शासन के बीच एक सेतु की भूमिका निभाते हैं, और यही सेतु लोकतंत्र को मजबूत करता है।
आज जब हम सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की बात करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि इन लक्ष्यों की पूर्ति संसदों के बिना संभव नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, लैंगिक समानता और गरीबी उन्मूलन जैसे मुद्दों पर संसदों के निर्णय सीधे तौर पर प्रभाव डालते हैं। जब संसद किसी योजना को पारित करती है या बजट में किसी सामाजिक क्षेत्र को प्राथमिकता देती है, तो वह एक बड़ी वैश्विक दिशा तय करती है।
संसदों की एक और महत्वपूर्ण भूमिका होती है — जनता के हित में निगरानी रखना। वे न केवल नीति बनाती हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करती हैं कि नीतियों का सही तरीके से पालन हो। यदि सरकारें दिशा से भटकें, तो संसदें उन्हें जवाबदेह बनाती हैं। यह जवाबदेही ही लोकतंत्र का असली चेहरा है।
इसके अतिरिक्त, संसदें समावेशिता और प्रतिनिधित्व की मिसाल पेश कर सकती हैं। जब महिलाएं, युवाएं, आदिवासी, और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग संसद में पहुंचते हैं, तो नीतियों में उनका दृष्टिकोण भी शामिल होता है। यही वह दृष्टिकोण है जो सतत और न्यायसंगत विकास की नींव रखता है।
हालांकि, यह भी स्वीकार करना होगा कि सभी देशों की संसदें समान रूप से सक्षम नहीं हैं। कहीं संसाधनों की कमी है, तो कहीं पारदर्शिता और स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते हैं। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए हमें संसदों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना होगा, प्रतिनिधित्व में विविधता को बढ़ावा देना होगा, और संसदीय प्रक्रियाओं में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
इस अंतरराष्ट्रीय संसदवाद दिवस पर हमें यह समझने की ज़रूरत है कि संसदें सिर्फ राजनीतिक चर्चाओं का मंच नहीं हैं, बल्कि वे हमारे भविष्य की दिशा तय करने वाले केंद्र हैं। यदि हम एक सशक्त, न्यायपूर्ण और टिकाऊ समाज की कल्पना करते हैं, तो उसकी शुरुआत एक जीवंत, पारदर्शी और उत्तरदायी संसद से ही होती है।
