डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर सीएम योगी ने दी श्रद्धांजलि: एक विचारशील श्रद्धांजलि

6 जुलाई, 2025 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी 125वीं जयंती पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने उनके महान योगदानों को याद किया और देश की एकता के लिए उनके बलिदान को नमन किया।
एक महान शिक्षाविद और देशभक्त
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी न केवल एक शिक्षाविद थे, बल्कि एक महान स्वतंत्रता सेनानी और विचारक भी थे। वर्ष 1943 के बंगाल अकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए सेवा कार्यों को देश आज भी श्रद्धापूर्वक याद करता है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ था। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय रहा है।
जम्मू-कश्मीर के सवाल पर अडिग रुख
सीएम योगी ने याद किया कि डॉ. मुखर्जी ने उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था, जब सरकार जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की दिशा में आगे बढ़ रही थी। उन्होंने इस निर्णय का कड़ा विरोध किया और देश की एकता के लिए संघर्ष का रास्ता चुना।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. मुखर्जी के सपनों को साकार किया है, जब अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में लाया गया। उन्होंने कहा कि यह डॉ. मुखर्जी के विचारों और संकल्पों की जीत है।
दिल्ली में भी दी गई श्रद्धांजलि
इस अवसर पर दिल्ली में भी एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ, जिसमें केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव, भाजपा दिल्ली अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और कई अन्य नेताओं ने डॉ. मुखर्जी को श्रद्धांजलि दी।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भारतीय जनसंघ के संस्थापक के रूप में जाना जाता है, जो आज की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वैचारिक नींव है। वे न केवल एक राजनेता थे, बल्कि एक समाजसेवी, शिक्षाविद और राष्ट्रभक्त भी थे।
निष्कर्ष
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन देश की एकता, अखंडता और आत्मसम्मान के लिए समर्पित था। उनकी जयंती पर दी गई यह श्रद्धांजलि न केवल एक सम्मान है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी है कि किस तरह एक व्यक्ति अपने सिद्धांतों के लिए पूरी निष्ठा से संघर्ष कर सकता है।
भारत आज भी डॉ. मुखर्जी के योगदानों को ससम्मान याद करता है और उनके विचारों को जीवन में उतारने का प्रयास करता है।
