फ़रवरी 14, 2026

चुनाव आयोग की सुस्ती पर सवाल: लोकतंत्र की रफ़्तार क्यों थम रही है?

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🗳️ भूमिका
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव आयोग को हमेशा निष्पक्ष, पारदर्शी और तेज़ कार्रवाई करने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है। लेकिन हाल ही में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि चुनाव से जुड़े मामलों में आयोग की रफ़्तार इतनी धीमी है कि लोकतंत्र की बुनियाद हिल सकती है।


18 हज़ार वोट कटने का मामला

अखिलेश यादव ने याद दिलाया कि उनकी पार्टी ने पहले भी चुनाव आयोग को हलफ़नामे और दस्तावेज़ सौंपे थे, जिनमें 18,000 वोटों के कटने का आरोप था। उन्होंने मांग की कि आयोग स्पष्ट करे कि उस शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर वोट कटना केवल एक तकनीकी भूल नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता का विषय है।


‘सबसे तेज़-ट्रैक’ अदालतों की ज़रूरत

चुनाव से जुड़े विवादों और शिकायतों में अखिलेश यादव का मानना है कि केवल “फास्ट-ट्रैक” नहीं, बल्कि “सबसे तेज़-ट्रैक” अदालतों की ज़रूरत है। उनका तर्क है कि जैसे भ्रष्टाचार या संवेदनशील अपराधों के मामलों में समय पर न्याय जरूरी है, वैसे ही चुनावी मामलों में भी देरी लोकतंत्र की नींव कमजोर कर देती है।


नागरिक चार्टर का सवाल

अखिलेश यादव ने यह भी पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास कोई सिटिज़न चार्टर है, जिसमें यह तय हो कि किसी भी शिकायत या मामले पर कितने समय में निर्णय होगा। उनका मानना है कि स्पष्ट समयसीमा और पारदर्शी प्रक्रिया से ही जनता का भरोसा कायम रह सकता है।


‘कछुए’ जैसी रफ़्तार पर तंज

अपने बयान के अंत में उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि चुनाव आयोग की गति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि वह ‘कछुए’ से मुकाबला करने लगे। यह टिप्पणी सीधे तौर पर आयोग की धीमी कार्यवाही पर प्रहार करती है और संकेत देती है कि समय रहते कदम न उठाना लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है।


निष्कर्ष

लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया से ही नहीं, बल्कि शिकायतों के त्वरित और निष्पक्ष निपटारे से भी मज़बूत होता है। अगर चुनाव आयोग समय पर कार्रवाई नहीं करता, तो न सिर्फ राजनीतिक दलों का, बल्कि आम जनता का भी उस पर से भरोसा उठ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि चुनाव से जुड़े मामलों में पारदर्शिता, गति और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।


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