बक्सर का युद्ध: अंग्रेजी साम्राज्य की ओर बढ़ता निर्णायक कदम

18वीं सदी का मध्य भारत के इतिहास में राजनीतिक बदलावों और सत्ता संघर्षों का दौर था। इन्हीं घटनाओं में से एक थी बक्सर की लड़ाई, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थायी प्रभुत्व का मार्ग प्रशस्त किया। यह संघर्ष केवल सेनाओं का टकराव नहीं, बल्कि उस दौर के तीन प्रमुख शासकों और अंग्रेजों के बीच शक्ति की अंतिम परीक्षा थी।
युद्ध की तिथि और पक्ष
- तारीख: 22 अक्टूबर 1764
- ब्रिटिश पक्ष: ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना, नेतृत्व — मेजर हेक्टर मुनरो
- भारतीय पक्ष: तीन प्रभावशाली शासकों का गठबंधन—
- मीर कासिम – बंगाल का अपदस्थ नवाब
- शुजा-उद-दौला – अवध के नवाब
- शाह आलम द्वितीय – मुगल सम्राट
युद्ध के कारण
प्लासी के युद्ध (1757) के बाद अंग्रेजों का बंगाल प्रशासन और व्यापार में दखल तेजी से बढ़ गया।
मीर कासिम, जो उस समय बंगाल के नवाब थे, ने अंग्रेजों की व्यापारिक कर-मुक्त सुविधाओं पर नियंत्रण लगाने और प्रशासन में सुधार करने की कोशिश की।
इन कदमों से अंग्रेज असंतुष्ट हुए और उन्होंने मीर कासिम को पद से हटा दिया।
अपनी शक्ति पुनः प्राप्त करने के लिए, मीर कासिम ने अवध के नवाब और मुगल सम्राट के साथ गठबंधन किया, ताकि अंग्रेजों को बंगाल और आसपास के इलाकों से बाहर खदेड़ा जा सके। यही गठबंधन बक्सर के मैदान में निर्णायक युद्ध में बदल गया।
युद्ध का घटनाक्रम
22 अक्टूबर 1764 की सुबह, गंगा नदी के किनारे स्थित बक्सर के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आईं।
अंग्रेजी सेना संख्या में कम थी, लेकिन उनकी तोपखाना तकनीक, अनुशासित पैदल सेना और रणनीतिक चालों ने निर्णायक भूमिका निभाई।
भारतीय गठबंधन सेना, संख्या में अधिक होने के बावजूद, आपसी तालमेल की कमी और रणनीतिक एकरूपता के अभाव में पीछे रह गई।
युद्ध के अंत में ब्रिटिश सेना ने निर्णायक जीत हासिल की।
परिणाम और प्रभाव
- अवध के नवाब को अंग्रेजों का अधीनस्थ बनना पड़ा।
- शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेजों के साथ समझौते के तहत बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूली का अधिकार) ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी।
- इस युद्ध ने भारत में ब्रिटिश राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व की नींव को मजबूत किया, जिससे आने वाले दशकों में उनका साम्राज्य तेजी से फैला।
