स्वाति मालीवाल को बड़ी राहत: नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर करने के मामले में कोर्ट का बरी करने का आदेश

नई दिल्ली: राउज़ एवेन्यू अदालत ने बुधवार को दिल्ली महिला आयोग (DCW) की पूर्व अध्यक्ष स्वाति मालीवाल और अन्य सह-अभियुक्तों को उस आरोप से मुक्त कर दिया, जिसमें उन पर एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने का मामला दर्ज था। यह निर्णय न्यायपालिका के संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित और तथ्यों-आधारित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
यह प्रकरण वर्ष 2016 में बुराड़ी थाने में दर्ज हुआ था। शिकायत में कहा गया था कि स्वाति मालीवाल ने एक नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर की, जो कानून के तहत दंडनीय अपराध है। शुरू में यह मामला तिस हज़ारी अदालत में लंबित था, लेकिन मार्च 2025 में उनके राज्यसभा सदस्य बनने के बाद इसे राउज़ एवेन्यू कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।
स्वाति मालीवाल ने इस प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दी थी। हालांकि उच्च न्यायालय ने प्रारंभिक स्तर पर कार्यवाही पर रोक लगाई, मगर 2025 में याचिका को खारिज कर दिया गया। इसके बाद निचली अदालत ने आरोपों की जांच कर यह माना कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 74 और जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 86 के तहत अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार हैं।
28 जुलाई 2017 को अदालत ने औपचारिक रूप से आरोप संज्ञान में लेते हुए यह माना कि जांच के अनुसार उल्लिखित धाराओं के तहत अपराध घटित हुआ था। इस मामले में स्वाति मालीवाल के साथ दिल्ली महिला आयोग के तत्कालीन कर्मचारी भूपेंद्र सिंह पर भी आरोप तय हुए थे।
अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (ACMM) नेहा मित्तल ने अंतिम निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस साक्ष्यों से साबित करने में असफल रहा, जिसके चलते दोनों आरोपितों को बरी किया जाता है। अदालत ने आदेश दिया कि अभियुक्त अपील की स्थिति में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानत बॉन्ड भरें।
यह फैसला न केवल स्वाति मालीवाल के लिए व्यक्तिगत राहत है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि न्याय प्रक्रिया में किसी भी आरोप की पुष्टि ठोस प्रमाणों के आधार पर ही होती है। लंबे समय तक चलने वाली कानूनी कार्यवाही इस बात का उदाहरण है कि न्यायिक प्रणाली में धैर्य, सटीक जांच और निष्पक्ष सुनवाई कितनी अहम है।
