अफ़ग़ान युद्ध : एक गहन पड़ताल

अफ़ग़ानिस्तान का इतिहास हमेशा से संघर्षों, बाहरी हस्तक्षेपों और सत्ता के लिए लड़ाई से भरा रहा है। यह देश एशिया के हृदय स्थल पर स्थित होने के कारण न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामरिक और भौगोलिक दृष्टि से भी महाशक्तियों का आकर्षण केंद्र रहा है। अफ़ग़ान युद्ध को समझना केवल एक सैन्य टकराव का विश्लेषण नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपे राजनीतिक, धार्मिक और वैश्विक समीकरणों की गहराई को समझना भी आवश्यक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
19वीं सदी में अफ़ग़ानिस्तान को “ग्रेट गेम” का केंद्र माना गया, जब ब्रिटिश साम्राज्य और रूसी साम्राज्य इस क्षेत्र में प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहे थे। यह भूमि हमेशा से विदेशी ताकतों की रणनीति का हिस्सा रही। 1979 में सोवियत संघ का आक्रमण अफ़ग़ानिस्तान के आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ था। इसके जवाब में अमेरिका और पाकिस्तान ने मुजाहिदीनों को हथियार और प्रशिक्षण देकर खड़ा किया। सोवियत सेनाएँ 1989 में पीछे हट गईं, लेकिन युद्ध और अस्थिरता यथावत बनी रही।
तालिबान का उभार
सोवियत वापसी के बाद सत्ता शून्य की स्थिति ने तालिबान को जन्म दिया। 1990 के दशक में यह संगठन अफ़ग़ानिस्तान के अधिकांश हिस्सों पर काबिज हो गया। कठोर शरीयत कानून लागू करना, महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, तथा विरोधियों पर निर्मम दंड देना तालिबान शासन की पहचान बन गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मान्यता नहीं मिली, बल्कि इसकी नीतियों ने अफ़ग़ान जनता को और अधिक पीड़ा दी।
9/11 के बाद अमेरिका का हस्तक्षेप
11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमलों ने पूरी दुनिया की राजनीति बदल दी। हमले के जिम्मेदार संगठन अल-कायदा को अफ़ग़ानिस्तान में शरण मिलने का आरोप लगा। इसके बाद अमेरिका ने नाटो देशों के साथ मिलकर तालिबान शासन को गिरा दिया। नई सरकार बनाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास हुआ, लेकिन आतंकवाद, जातीय प्रतिद्वंद्विता और भ्रष्टाचार ने इन प्रयासों को कमजोर कर दिया।
दो दशक लंबा संघर्ष
2001 से लेकर 2021 तक अमेरिकी और नाटो सेनाएँ अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद रहीं। इस दौरान अरबों डॉलर खर्च हुए और हजारों सैनिकों व लाखों आम नागरिकों ने अपनी जान गंवाई। बावजूद इसके अफ़ग़ानिस्तान स्थिरता हासिल नहीं कर पाया। अंततः 2021 में अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद तालिबान ने तेजी से पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया।
मानवीय संकट और भविष्य की चुनौतियाँ
लगातार युद्ध ने अफ़ग़ानिस्तान को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में बेहद पीछे धकेल दिया। लाखों लोग विस्थापित हुए, महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हुए। आज भी वहां मानवीय सहायता की भारी आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय सहायता प्रदान कर रहा है, लेकिन स्थायी समाधान तभी संभव है जब अफ़ग़ानिस्तान के भीतर शांति, समावेशी शासन और समान अधिकारों का ढांचा स्थापित हो।
निष्कर्ष
अफ़ग़ान युद्ध केवल हथियारों और सैनिकों की लड़ाई नहीं, बल्कि महाशक्तियों के हितों, धार्मिक कट्टरता और आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम रहा है। बीते दशकों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश में स्थिरता बाहरी हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी, पारदर्शी शासन और न्यायपूर्ण व्यवस्था से ही आ सकती है। अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कब तक अपने अतीत की जंजीरों को तोड़कर शांति और विकास की राह पर आगे बढ़ पाता है।
