पाकिस्तान में वकीलों की बड़ी सभा: विवादित संशोधनों पर व्यापक विरोध, न्यायपालिका की स्वायत्तता बचाने का संकल्प

पाकिस्तान में हाल ही में किए गए 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों ने देश के कानूनी समुदाय में गहरी नाराज़गी पैदा कर दी है। लाहौर में आयोजित एक विशाल वकील सम्मेलन में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इन संशोधनों को संविधान की मूल संरचना के लिए “खतरा” बताते हुए कड़े शब्दों में विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि ये बदलाव न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास हैं।
लाहौर में ऐतिहासिक सम्मेलन, संयुक्त प्रस्ताव हुआ पारित
यह बड़ा सम्मेलन लाहौर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (LHCBA) और लाहौर बार एसोसिएशन (LBA) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया, जिसमें देशभर से वकील शामिल हुए। लंबी चर्चा और विचार-विमर्श के बाद प्रतिनिधियों ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में न्यायिक संस्थाओं की स्वायत्तता की रक्षा, संविधान के संतुलन को बनाए रखने और सरकार द्वारा की जा रही “अतिरिक्त दखलअंदाज़ी” को रोकने की मांग शामिल थी।
“संविधान की आत्मा को आघात” — अधिवक्ताओं का आरोप
सम्मेलन में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि ये संशोधन पाकिस्तान के संवैधानिक ढांचे की मूल आत्मा को प्रभावित करते हैं। उनका मानना है कि न्यायपालिका पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश देश की लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए खतरनाक है। कई वरिष्ठ वकीलों ने चेतावनी दी कि यदि ऐसे कदम ना रोके गए, तो इससे संस्थागत संतुलन बिगड़ सकता है और जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कम हो सकता है।
