राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग: लोकतंत्र की सुरक्षा का सवाल या सिर्फ़ राजनीतिक टकराव?

भारत का चुनाव आयोग हमेशा से लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मज़बूत स्तंभ माना जाता रहा है। लेकिन हाल के दिनों में यह संस्था राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आयोग की पारदर्शिता और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर तीन महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, जिन्होंने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
राहुल गांधी के तीन प्रमुख सवाल: क्या दांव पर है?
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी करते हुए चुनाव आयोग पर सीधे-सीधे तीन सवाल उठाए:
1. चयन समिति से CJI को हटाने की वजह क्या?
उन्होंने पूछा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म करने का निर्णय क्यों लिया गया, जबकि इससे चयन प्रक्रिया का संतुलन और पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है।
2. 2024 चुनाव से पहले आयोग को लगभग सम्पूर्ण कानूनी छूट क्यों?
उनका दावा है कि चुनाव आयोग को व्यापक इम्युनिटी देकर उसके कार्यों पर जवाबदेही कमजोर कर दी गई है।
3. CCTV फुटेज को 45 दिनों में नष्ट करने की जल्दबाज़ी क्यों?
राहुल गांधी का आरोप है कि इतने कम समय में फुटेज हटाने से सत्यापन और जांच की प्रक्रिया बाधित होती है।
इन सवालों के साथ उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा चुनाव आयोग का राजनीतिक लाभ लेने के लिए “दुरुपयोग” कर रही है।
संसद में राहुल गांधी का तीखा बयान
9 दिसंबर 2025 को संसद में चुनाव सुधारों पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने सरकार और RSS पर संवैधानिक संस्थाओं को नियंत्रित करने का सीधा आरोप लगाया। उनका कहना था कि:
- संस्थागत कब्जा लोकतंत्र को असुरक्षित बनाता है
- चुनाव आयुक्तों को कानूनी कार्रवाई से बचाने वाला नया कानून लोकतांत्रिक नियंत्रण को कमजोर करता है
- कांग्रेस सत्ता में आएगी तो इस कानून को वापस लेगी और उसे लागू होने की तिथि से ही बदल देगी
उनका बयान संसद में राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज़ करता दिखाई दिया।
विपक्ष की आपत्तियाँ: क्या मतदाता सूची में गड़बड़ी हुई?
कई विपक्षी दलों ने दावा किया है कि चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं को सूची से हटाया गया है।
यह विवाद विशेष रूप से महाराष्ट्र और हरियाणा के 2024 विधानसभा चुनावों के दौरान सामने आया था।
विपक्ष का आरोप है कि:
- कई सही मतदाताओं के नाम हटाए गए
- मतदाता सत्यापन की प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी नहीं थी
- इससे चुनावी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं
चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण
चुनाव आयोग ने आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि:
- SIR पूरी तरह नियमों के अनुसार चलती है
- CCTV फुटेज की 45 दिन की सीमा डेटा प्रबंधन और संसाधनों के हिसाब से तय की गई है
- मतदाता सूची में किसी भी बदलाव की प्रक्रिया सार्वजनिक और सुव्यवस्थित होती है
हालाँकि, आयोग ने CJI को चयन पैनल से हटाने के मामले पर टिप्पणी नहीं की, जिससे राजनीतिक चर्चा और बढ़ गई।
निष्कर्ष: बहस का उद्देश्य—पारदर्शिता या राजनीति?
राहुल गांधी के सवाल सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को सामने लाते हैं। चुनाव आयोग जैसी संस्था पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक ढांचे की रीढ़ है। इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि:
- सरकार संस्थागत सुधारों पर स्पष्टता दे
- चुनाव आयोग अपने निर्णयों की पारदर्शी व्याख्या करे
- विपक्ष रचनात्मक सवाल उठाए, न कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए
लोकतंत्र की मजबूती तभी सुनिश्चित हो सकती है जब चुनाव प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार की शंका की गुंजाइश न रहे।
