फ़रवरी 14, 2026

उत्तर प्रदेश लेखपाल भर्ती और ओबीसी आरक्षण विवाद: क्या संवैधानिक संतुलन बिगड़ रहा है?

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उत्तर प्रदेश में 7994 लेखपाल पदों पर घोषित नई भर्ती ने एक बार फिर आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों को केंद्र में ला खड़ा किया है। इस भर्ती प्रक्रिया में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को दिए गए आरक्षण को लेकर तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार ने ओबीसी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों में कटौती की है, जिससे यह मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और सामाजिक चिंता का विषय बन गया है।


🔢 विवाद का आधार: गणितीय असंतुलन

भर्ती से जुड़े आंकड़े इस पूरे विवाद की जड़ हैं—

  • कुल पद: 7994
  • ओबीसी के लिए घोषित आरक्षित पद: 1441
  • संवैधानिक प्रावधान (27%) के अनुसार अपेक्षित पद: 2158
  • अंतर / कमी: 717 पद

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ओबीसी वर्ग को निर्धारित प्रतिशत के अनुसार पूरा लाभ नहीं मिला। इसके विपरीत, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10% आरक्षण के तहत सभी 792 पद दिए गए, जिससे असमानता का आरोप और गहरा गया।


⚖️ संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को यह अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करे। ओबीसी के लिए 27% आरक्षण इसी संवैधानिक ढांचे का हिस्सा है।
यदि किसी सरकारी भर्ती में इस अनुपात का पालन नहीं किया जाता, तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि संवैधानिक भावना के विरुद्ध कदम माना जा सकता है।


🗳️ राजनीतिक प्रतिक्रिया और सामाजिक हलचल

इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी मुखर रूप से सामने आई है। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से भाजपा पर “आरक्षण और संविधान विरोधी सोच” का आरोप लगाया और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
वहीं प्रयागराज, लखनऊ सहित कई जिलों में छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा और संशोधन की मांग उठाई है।


🏛️ आयोग और सरकार का रुख

उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) ने 16 दिसंबर को भर्ती विज्ञापन जारी किया था। विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को आरक्षण नियमों के सख्त पालन के निर्देश दिए हैं। हालांकि, अब तक न तो आयोग की ओर से संशोधित आंकड़े जारी किए गए हैं और न ही कोई स्पष्ट समाधान सामने आया है।


🔎 निष्कर्ष: तकनीकी त्रुटि या गहरी नीति समस्या?

यह मामला केवल सीटों की गणना में हुई चूक तक सीमित नहीं दिखता। यह ओबीसी समुदाय में यह भावना पैदा कर रहा है कि उनके संवैधानिक अधिकारों को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया जा रहा है।
यदि समय रहते पारदर्शी और ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो यह विवाद भर्ती प्रक्रिया की वैधता, सरकार की नीयत और सामाजिक संतुलन—तीनों पर सवाल खड़े कर सकता है।

आरक्षण कोई साधारण संख्या नहीं, बल्कि समान अवसर और सामाजिक न्याय की आधारशिला है।
राज्य सरकार और आयोग की जिम्मेदारी है कि वे संविधान की मूल भावना के अनुरूप इस विवाद का समाधान करें, ताकि भविष्य में ऐसे हालात दोबारा उत्पन्न न हों।


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