फ़रवरी 12, 2026

चंबल की पुकार और सियासत का वार: अखिलेश यादव ने अवैध खनन पर सरकार को घेरा

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उत्तर प्रदेश की चंबल घाटी एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। इटावा जिले के बीहड़ क्षेत्र में कथित अवैध खनन को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के ज़रिये भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका यह हस्तक्षेप केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पर्यावरण और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न भी उठाता है।

🌄 बीहड़ों में मशीनों की गूंज, प्रकृति की चुप्पी

अखिलेश यादव द्वारा साझा किए गए वीडियो में चंबल की पहाड़ियों को छलनी करती भारी मशीनें दिखाई देती हैं। हर गड्ढा इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक संतुलन को किस तरह अनदेखा किया जा रहा है। अपने संदेश में उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि जिस आधार पर विकास का सपना टिका है, यदि वही नष्ट हो गया तो परिणाम विनाशकारी होंगे।

⚙️ सवालों के घेरे में सत्ता और व्यवस्था

सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि सुमेर सिंह किले के आसपास चल रहा खनन बिना संरक्षण के संभव नहीं है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए पूछा कि क्या इन पहाड़ियों की भी “फाइल ट्रांसफर” कर दी गई है। यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक चुप्पी और कथित राजनीतिक संरक्षण की ओर इशारा करती है।

🐊 चंबल का पर्यावरण: अनदेखा खज़ाना

चंबल घाटी केवल भूगोल नहीं, बल्कि जीवन का आश्रय है। घड़ियाल, कछुए, प्रवासी पक्षी और कई दुर्लभ प्रजातियाँ इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। अनियंत्रित खनन से नदी का बहाव, मिट्टी की संरचना और जैव विविधता सभी संकट में पड़ रहे हैं। इसका प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

🗳️ राजनीति से आगे का संदेश

अखिलेश यादव का यह कदम आगामी चुनावी रणनीति का हिस्सा ज़रूर हो सकता है, लेकिन इसका सामाजिक अर्थ कहीं बड़ा है। उनका हमला भ्रष्टाचार, संसाधनों की लूट और पर्यावरणीय उपेक्षा के खिलाफ जन-मत तैयार करने की कोशिश भी है। यह संदेश जनता को यह सोचने पर मजबूर करता है कि विकास और विनाश के बीच की रेखा कहाँ खींची जानी चाहिए।

🌱 निष्कर्ष: चेतावनी या अंतिम अवसर?

चंबल में हो रहा खनन केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का सवाल है। यदि प्राकृतिक धरोहरें यूँ ही नष्ट होती रहीं, तो न कानून बचेंगे, न विकास। अखिलेश यादव का ट्वीट इसी सन्दर्भ में एक चेतावनी की तरह है—कि प्रकृति के खिलाफ लिया गया हर फैसला अंततः समाज के खिलाफ ही जाएगा।

प्रकृति की रक्षा कोई राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि सामूहिक ज़िम्मेदारी है।


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