मणिपुर के मोइरांगथेम सेठ: पहाड़ों में सौर ऊर्जा की क्रांति

पूर्वोत्तर भारत के सुदूर पहाड़ी इलाकों में अक्सर विकास की रोशनी देर से पहुँचती है, लेकिन मणिपुर के मोइरांगथेम सेठ ने यह साबित कर दिया कि सशक्त सोच और सही तकनीक मिल जाए, तो अंधेरा ज्यादा देर टिक नहीं सकता। 40 वर्ष से कम उम्र में उन्होंने ऐसा कार्य कर दिखाया है, जिसने सैकड़ों परिवारों और स्वास्थ्य सेवाओं की ज़िंदगी बदल दी है।
⚡ जब समस्या बनी समाधान की वजह
मणिपुर के कई गांव वर्षों से बिजली संकट से जूझते रहे हैं। दुर्गम भौगोलिक स्थिति और सीमित संसाधनों के कारण सरकारी लाइनें वहाँ तक नहीं पहुँच सकीं। इसी मुश्किल को मोइरांगथेम सेठ ने अवसर के रूप में देखा। उन्होंने परंपरागत बिजली पर निर्भर रहने के बजाय सौर ऊर्जा को स्थायी विकल्प के रूप में चुना।
🔧 पहाड़ियों तक सौर तकनीक का सफ़र
सेठ का काम केवल योजना बनाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने खुद पहाड़ी रास्तों से सौर पैनल पहुंचाने, उन्हें स्थापित करने और ग्रामीणों को इसके रखरखाव की जानकारी देने में अहम भूमिका निभाई। उनका प्रयास तकनीकी समाधान के साथ-साथ स्थानीय लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी एक कदम था।
🏥 स्वास्थ्य सेवाओं को मिली नई ताकत
सबसे बड़ा बदलाव तब दिखा जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सौर ऊर्जा की व्यवस्था शुरू हुई। जहाँ पहले बिजली न होने से रात की चिकित्सा सेवाएँ बाधित होती थीं, अब वहीं रोशनी, उपकरण और आपातकालीन सुविधाएँ सुचारु रूप से चल रही हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज की गुणवत्ता और भरोसा—दोनों बढ़े हैं।
🌍 आत्मनिर्भर भारत की ज़मीनी मिसाल
मोइरांगथेम सेठ के प्रयासों को प्रधानमंत्री कार्यालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से सराहना मिली है। उनका कार्य यह साबित करता है कि आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल केवल नारे नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर किए गए प्रयासों से साकार हो सकते हैं।
✨ निष्कर्ष
मोइरांगथेम सेठ की कहानी बताती है कि बदलाव की शुरुआत बड़े मंच से नहीं, बल्कि छोटे क्षेत्रों में बड़े इरादों से होती है। उनका समर्पण और नवाचार न केवल मणिपुर, बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा है—कि सीमाएँ हालात तय करते हैं, सपने नहीं।
