फ़रवरी 13, 2026

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का पनडुब्बी अभियान: समुद्र की गहराइयों से देश की ताक़त का संदेश

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भारत के समुद्री इतिहास में 28 दिसंबर 2025 का दिन एक यादगार अध्याय के रूप में दर्ज हो गया, जब राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कर्नाटक स्थित कारवार नौसैनिक अड्डे से भारतीय नौसेना की स्वदेशी पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर पर सवार होकर समुद्री अभियान का प्रत्यक्ष अनुभव किया। यह यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा, आत्मविश्वास और सैन्य संकल्प का सशक्त प्रतीक बनी।

नेतृत्व और सैन्य बलों के बीच जीवंत संवाद

राष्ट्रपति का पनडुब्बी में प्रवेश स्वयं में असाधारण है। गहरे समुद्र में संचालित होने वाली इस अत्याधुनिक युद्ध प्रणाली को समझना और उसके संचालन का अनुभव लेना, यह दर्शाता है कि देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद सैन्य बलों के साथ केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से भी जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी की उपस्थिति ने इस यात्रा को और अधिक महत्व प्रदान किया।

आईएनएस वाघशीर: आत्मनिर्भर भारत की तकनीकी छलांग

आईएनएस वाघशीर कलवरी श्रेणी की नवीनतम पनडुब्बियों में से एक है, जिसे भारत में ही डिज़ाइन और निर्मित किया गया है। यह पनडुब्बी आधुनिक युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप गोपनीय संचालन, समुद्री निगरानी और सामरिक हमलों में सक्षम है। इसकी निर्माण प्रक्रिया यह स्पष्ट करती है कि भारत अब रक्षा तकनीक के क्षेत्र में आयातक नहीं, बल्कि एक सक्षम निर्माता के रूप में उभर रहा है।

मनोबल, संदेश और सामरिक संकेत

राष्ट्रपति की यह समुद्री यात्रा नौसेना के अधिकारियों और जवानों के लिए प्रेरणास्रोत बनी। इससे यह स्पष्ट संदेश गया कि देश का नेतृत्व उनके परिश्रम, त्याग और तत्परता को गहराई से समझता है। साथ ही, यह कदम वैश्विक मंच पर भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता और रणनीतिक गंभीरता को भी रेखांकित करता है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा

यह यात्रा केवल वर्तमान की उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य के लिए प्रेरक उदाहरण है। इससे युवाओं में विज्ञान, तकनीक और रक्षा सेवाओं के प्रति रुचि बढ़ेगी और राष्ट्रसेवा की भावना को नया आयाम मिलेगा।

निष्कर्ष

पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की यह ऐतिहासिक उपस्थिति भारत की समुद्री शक्ति, स्वदेशी तकनीक और सशक्त नेतृत्व का प्रतीक बन गई है। यह क्षण दिखाता है कि भारत न केवल ज़मीन और आकाश में, बल्कि समुद्र की गहराइयों में भी आत्मविश्वास के साथ अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम है।


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