भारत की वैश्विक पहचान: सभ्यता, लोकतंत्र और साझेदारी की आधुनिक परिभाषा

भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक सतत प्रवाह वाली सभ्यता है, जिसने समय, संघर्ष और परिवर्तन के हर दौर में अपनी पहचान को नया रूप दिया है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने IIT मद्रास में ‘शास्त्र’ टेक फेस्ट के उद्घाटन अवसर पर भारत की ऐतिहासिक यात्रा और वैश्विक भूमिका पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया।
समय की कसौटी पर जीवित सभ्यता
अपने संबोधन में डॉ. जयशंकर ने रेखांकित किया कि विश्व में ऐसी सभ्यताएं बहुत कम हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों की निरंतरता के साथ आज के आधुनिक राष्ट्र-राज्य का स्वरूप लिया हो। भारत उनमें अग्रणी है। उन्होंने कहा कि भारत का अतीत केवल स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान नीति और भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति है।
लोकतंत्र: भारत का वैश्विक योगदान
जयशंकर के अनुसार, भारत का लोकतंत्र अपनाना केवल एक आंतरिक निर्णय नहीं था, बल्कि इसका वैश्विक प्रभाव पड़ा। यदि भारत जैसा विशाल और विविधतापूर्ण समाज लोकतंत्र के मार्ग पर सफल नहीं होता, तो संभव है कि लोकतंत्र को एक सीमित राजनीतिक प्रयोग माना जाता। भारत ने इसे जन-आधारित और सार्वभौमिक विचारधारा के रूप में स्थापित किया।
पश्चिम के साथ संतुलित सहयोग
विदेश मंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत की वैश्विक भूमिका संवाद और साझेदारी पर आधारित है, न कि टकराव पर। पश्चिमी देशों के साथ सहयोग को उन्होंने आवश्यक बताया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह साझेदारी भारत की सांस्कृतिक पहचान और मूल्यों के साथ संतुलन बनाकर ही सार्थक हो सकती है।
कम संसाधन, व्यापक प्रभाव
अपने भाषण में जयशंकर ने यह भी स्वीकार किया कि भारत के पास असीम संसाधन नहीं हैं, फिर भी वह रणनीतिक सोच, संस्थागत मजबूती और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए वैश्विक प्रभाव बढ़ा रहा है। तंज़ानिया में IIT मद्रास के अंतरराष्ट्रीय कैंपस की स्थापना को उन्होंने शिक्षा-आधारित कूटनीति का एक सशक्त उदाहरण बताया।
‘वसुधैव कुटुंबकम’: भारत की विदेश नीति का आधार
भारत की वैश्विक सोच को समझाते हुए जयशंकर ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा को केंद्र में रखा। उनका कहना था कि भारत ने सदैव दुनिया को साझेदार के रूप में देखा है, प्रतिस्पर्धी या शत्रु के रूप में नहीं। यही दृष्टिकोण भारत की समावेशी और मानवतावादी विदेश नीति को दिशा देता है।
यह संबोधन भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जो अपनी प्राचीन जड़ों से जुड़ा रहते हुए आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोज रहा है। संवाद, सहयोग और आत्मविश्वास—यही वे स्तंभ हैं जिन पर भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका को मज़बूत कर रहा है।
