संगम तट पर श्रद्धा का महासंगम: माघ मेले में पौष पूर्णिमा स्नान का आध्यात्मिक वैभव

भारतीय जीवन परंपरा में नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और आत्मिक चेतना की संवाहक मानी जाती हैं। इन्हीं मूल्यों को साकार रूप देता है प्रयागराज में आयोजित होने वाला माघ मेला, जिसकी शुरुआत पौष पूर्णिमा के पावन स्नान पर्व से होती है। 3 जनवरी 2026 को त्रिवेणी संगम पर आस्था का ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। अनुमानतः 31 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
कल्पवास का संकल्प और साधना का मार्ग
पौष पूर्णिमा के साथ ही कल्पवास की परंपरा आरंभ हो जाती है। कल्पवासी एक मास तक संगम क्षेत्र में निवास कर संयमित जीवन, जप-तप, सेवा और साधना का अनुसरण करते हैं। इस वर्ष भी देश के कोने-कोने से आए साधकों और श्रद्धालुओं ने कल्पवास का संकल्प लिया। साधु-संतों, अखाड़ों और धार्मिक प्रवचनों ने संपूर्ण मेले को आध्यात्मिक वातावरण से भर दिया।
सुव्यवस्थित आयोजन और प्रशासन की भूमिका
भारी जनसमूह के बावजूद माघ मेले का आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित रहा। सुरक्षा, यातायात, स्वच्छता, चिकित्सा और स्नान व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में प्रशासनिक तंत्र, पुलिस बल, सफाईकर्मियों, नाविकों और स्वयंसेवकों की भूमिका सराहनीय रही। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सफल आयोजन के लिए सभी संबंधित विभागों और कर्मचारियों के योगदान की प्रशंसा की और इसे टीमवर्क का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का पर्व
माघ मेला केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और सांस्कृतिक विविधता का उत्सव भी है। विभिन्न जाति, भाषा और प्रांतों से आए लोग संगम तट पर एक साथ स्नान कर भारतीय एकता का जीवंत दर्शन प्रस्तुत करते हैं। यहाँ गंगा स्नान आत्मशुद्धि के साथ-साथ मानसिक शांति और नैतिक ऊर्जा का अनुभव कराता है।
उपसंहार
पौष पूर्णिमा के स्नान पर्व के साथ माघ मेला 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की आध्यात्मिक परंपराएँ आज भी समाज को जोड़ने और दिशा देने का कार्य कर रही हैं। प्रयागराज का संगम तट केवल तीन नदियों का संगम नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और सामूहिक चेतना का संगम है। माघ मेले की यह पावन शुरुआत आने वाले समय के लिए आध्यात्मिक स्फूर्ति और सामाजिक सद्भाव का संदेश देती है।
