फ़रवरी 12, 2026

सुप्रीम कोर्ट के सामने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण: जांच समिति की संवैधानिक वैधता पर अहम मोड़

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भारतीय न्याय व्यवस्था से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ गठित संसदीय जांच समिति की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। यह मामला केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों की जवाबदेही के बीच संतुलन की संवैधानिक परीक्षा बन चुका है।


🔎 विवाद की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा, जो पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में पदस्थ थे, मार्च 2025 में उस समय विवादों में आए जब उनके सरकारी आवास से जली हुई नकदी मिलने की खबर सामने आई। इसके बाद उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया।

घटना के बाद लोकसभा में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर महाभियोग प्रस्ताव पेश किया गया। लोकसभा अध्यक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जिससे विवाद और गहरा गया।


⚖️ न्यायमूर्ति वर्मा की संवैधानिक आपत्ति

न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत निर्धारित है। इस कानून के अनुसार:

  • महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा—दोनों सदनों में स्वीकार किया जाना आवश्यक है।
  • केवल राज्यसभा के सभापति को प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है।

वकीलों का तर्क था कि जब राज्यसभा में प्रस्ताव को उपसभापति द्वारा अस्वीकार किया गया, तो यह कार्यवाही संवैधानिक रूप से त्रुटिपूर्ण हो गई, जिससे पूरी जांच प्रक्रिया की वैधता संदेह के घेरे में आ गई।


🏛️ सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने तीन दिनों तक विस्तृत सुनवाई की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गंभीर प्रश्न उठाए, जिनमें शामिल हैं:

  • क्या राज्यसभा के सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति को इस तरह के प्रस्ताव पर निर्णय लेने का अधिकार है?
  • यदि उपसभापति द्वारा लिया गया निर्णय अमान्य पाया जाता है, तो क्या पूरी महाभियोग प्रक्रिया निष्क्रिय मानी जाएगी?

इन सवालों के साथ अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।


📌 आगे की प्रक्रिया

वर्तमान स्थिति में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को 24 जनवरी 2026 को गठित जांच समिति के समक्ष पेश होना है। इससे पहले उन्हें अपने बचाव में लिखित उत्तर भी दाखिल करना अनिवार्य है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला इस बात को तय करेगा कि जांच समिति की आगे की कार्यवाही जारी रहेगी या नहीं।


🧭 व्यापक संवैधानिक प्रभाव

यह मामला भारतीय लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों—न्यायपालिका, विधायिका और संविधान—के आपसी संतुलन से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

  • संसद को न्यायाधीशों के विरुद्ध कार्रवाई की सीमाएँ स्पष्ट कर सकता है,
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता की सुरक्षा को मजबूत या पुनर्परिभाषित कर सकता है,
  • और भविष्य में महाभियोग जैसी प्रक्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल बन सकता है।

यदि जांच समिति को असंवैधानिक ठहराया जाता है, तो यह न केवल इस मामले को प्रभावित करेगा, बल्कि आगे आने वाले ऐसे सभी मामलों की प्रक्रिया पर भी गहरा असर डालेगा।


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