उत्तर प्रदेश में SIR विवाद: मतदाता सूची के आंकड़े क्यों टकरा रहे हैं?

उत्तर प्रदेश की चुनावी व्यवस्था इन दिनों एक गंभीर सवालों के घेरे में है। मतदाता सूची से जुड़े आंकड़ों में सामने आए विरोधाभास ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष और भरोसेमंद है। विधानसभा और पंचायत चुनावों के लिए जारी मतदाता आंकड़ों के बीच भारी अंतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
SIR क्या है और इसका उद्देश्य क्या होता है?
SIR अर्थात Systematic Inclusion and Revision (या Systematic Voters’ Registration) वह औपचारिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से चुनाव आयोग मतदाता सूची को समय-समय पर संशोधित करता है। इसका मकसद मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना, गलत प्रविष्टियों को ठीक करना और नए योग्य मतदाताओं को सूची में शामिल करना होता है। इस पूरी प्रक्रिया का क्रियान्वयन बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के माध्यम से किया जाता है।
आंकड़ों में उलझन कहां से शुरू होती है?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—
- विधानसभा चुनावों की तैयारी के दौरान कराई गई SIR प्रक्रिया में राज्य के मतदाताओं की संख्या लगभग 2.89 करोड़ घटकर 12.56 करोड़ दर्शाई गई।
- वहीं, पंचायत चुनावों के लिए कराई गई SIR प्रक्रिया में ग्रामीण मतदाताओं की संख्या में लगभग 40 लाख की वृद्धि दिखाई गई, जिससे कुल आंकड़ा 12.69 करोड़ तक पहुंच गया।
- खास बात यह है कि दोनों ही प्रक्रियाएं एक ही समय अवधि में और एक ही BLO नेटवर्क द्वारा संचालित की गई थीं।
यहीं से संदेह की स्थिति पैदा होती है।
उठते हैं कई असहज सवाल
इन आंकड़ों को देखते हुए कुछ स्वाभाविक प्रश्न सामने आते हैं—
- जब प्रक्रिया, अधिकारी और समय समान थे, तो मतदाता संख्या में इतना विरोधाभास कैसे संभव है?
- क्या विधानसभा चुनावों के दौरान मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए?
- या फिर पंचायत चुनावों के लिए सूची में असामान्य रूप से नाम जोड़े गए?
- क्या यह तकनीकी चूक है या किसी दबाव का परिणाम?
राजनीतिक प्रतिक्रिया और सार्वजनिक बहस
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव आयोग से स्पष्ट जवाब मांगा है। उनका कहना है कि “जब दोनों प्रक्रियाएं समान हैं, तो दोनों के आंकड़े एक साथ सही कैसे हो सकते हैं?” विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ दल के प्रभाव में चुनावी आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ की गई है, जिससे चुनावी संतुलन प्रभावित हुआ है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए क्यों है यह अहम?
मतदाता सूची केवल एक सरकारी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के मताधिकार का आधार है। यदि इस सूची की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न होता है, तो चुनाव की निष्पक्षता भी कटघरे में आ जाती है। इससे न केवल राजनीतिक दलों का भरोसा टूटता है, बल्कि आम नागरिक का लोकतंत्र से विश्वास भी कमजोर पड़ता है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में SIR प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन विरोधाभासी आंकड़ों पर स्पष्ट, तथ्यात्मक और पारदर्शी स्पष्टीकरण दे। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या गड़बड़ी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मतदाता सूची पर जनता का विश्वास बना रहे।
