लुधियाना में नकली नशा मुक्ति केंद्रों का काला सच: इलाज नहीं, शोषण का कारोबार

पंजाब में नशे की समस्या लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक चुनौती रही है। इसी कमजोरी को ढाल बनाकर कुछ लोग “नशा मुक्ति” के नाम पर ऐसा धंधा चला रहे हैं, जो इंसानियत को शर्मसार करता है। लुधियाना जिले के खन्ना इलाके में हाल ही में प्रशासन और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई ने इसी काले सच को उजागर कर दिया, जब अवैध रूप से संचालित कई तथाकथित डी-एडिक्शन केंद्रों पर छापेमारी की गई।
छापेमारी में सामने आई भयावह तस्वीर
कार्रवाई के दौरान इन केंद्रों से 150 से अधिक लोगों को बाहर निकाला गया, जिनमें से कई महीनों से वहां बंद थे। बाहर आए लोगों की हालत देखकर अधिकारियों तक हैरान रह गए। भीड़भाड़ वाले कमरों, गंदगी, अव्यवस्थित रहने-खाने की व्यवस्था और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के अभाव ने स्पष्ट कर दिया कि इन जगहों का उद्देश्य इलाज नहीं, बल्कि कैद रखना था।
न लाइसेंस, न प्रशिक्षण—फिर भी “इलाज” का दावा
जांच में सामने आया कि अधिकांश केंद्रों के पास न तो स्वास्थ्य विभाग की अनुमति थी और न ही प्रशिक्षित डॉक्टर या काउंसलर। फिर भी मरीजों और उनके परिजनों से मोटी रकम वसूली जा रही थी। कई मामलों में परिवारों को यह तक नहीं बताया गया कि उनके परिजन किस हालत में रखे गए हैं।
डर और दबाव के जरिए चलता रहा खेल
मुक्त कराए गए लोगों ने बताया कि वहां से निकलना आसान नहीं था। विरोध करने वालों को डराया-धमकाया जाता था। कुछ को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ा। यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि ये केंद्र नशा मुक्ति नहीं, बल्कि अवैध हिरासत जैसे हालात में चल रहे थे।
प्रशासन की कार्रवाई और आगे की चुनौती
प्रशासन ने सभी अवैध केंद्रों को तत्काल सील कर दिया है और संचालकों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। संबंधित विभागों से पूछा गया है कि बिना निगरानी के ये केंद्र इतने समय तक कैसे चलते रहे। यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है।
असली सवाल: नशा मुक्ति व्यवस्था कितनी भरोसेमंद?
यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—क्या नशा मुक्ति के नाम पर चल रही संस्थाओं की नियमित जांच होती है? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार प्रमाणित, पारदर्शी और मानवीय इलाज व्यवस्था को मजबूत नहीं करेगी, तब तक ऐसे फर्जी केंद्र पनपते रहेंगे।
समाज और परिवारों की भूमिका
नशे से जूझ रहे व्यक्ति को इलाज के नाम पर कहीं भी भेज देने से पहले परिवारों को सतर्क रहने की जरूरत है। केंद्र का पंजीकरण, स्टाफ की योग्यता और इलाज की प्रक्रिया की जानकारी लेना बेहद जरूरी है। समाज को भी ऐसे मामलों में चुप रहने के बजाय आवाज उठानी होगी।
निष्कर्ष
लुधियाना में हुआ यह खुलासा सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। नशा मुक्ति जैसे संवेदनशील विषय पर लापरवाही और लालच सीधे-सीधे मानवाधिकारों का हनन बन जाते हैं। अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि नशे से लड़ाई इलाज और संवेदना से लड़ी जाए—शोषण और अमानवीयता से नहीं।
