बुलंदशहर में 10 रुपये लीटर गोमूत्र खरीदने की पहल पर अखिलेश यादव का तंज, बोले- ‘ट्रिलियन इकोनॉमी की ओर एक और कदम’

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बुलंदशहर में गोमूत्र खरीद की स्थानीय पहल को ग्रामीण आय, पशुपालन और प्राकृतिक खेती के नजरिए से देखा जा सकता है। हालांकि, इसे सीधे उत्तर प्रदेश की ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बताना उचित नहीं होगा। इस मॉडल की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों को नियमित भुगतान, संग्रह व्यवस्था और गोमूत्र से तैयार उत्पादों के लिए टिकाऊ बाजार कितना मिलता है। अखिलेश यादव की टिप्पणी इस पहल को राजनीतिक बहस के केंद्र में जरूर ले आई है, लेकिन आर्थिक प्रभाव का आकलन ठोस आंकड़ों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

लखनऊ/बुलंदशहर। उत्तर प्रदेश में गोवंश आधारित अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से जुड़ी एक स्थानीय पहल अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। बुलंदशहर में गोमूत्र को खरीदने की व्यवस्था शुरू किए जाने की खबर सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे उत्तर प्रदेश सरकार की ‘ट्रिलियन इकोनॉमी’ की दिशा में एक और कदम बताते हुए कहा कि विक्रेता भी कुछ न कुछ खरीदेंगे।

अखिलेश यादव की टिप्पणी उस खबर के संदर्भ में आई है, जिसमें बुलंदशहर में किसानों और पशुपालकों से गोमूत्र 10 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदे जाने की जानकारी दी गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इस पहल से 15 गांवों को जोड़ा गया है और प्रतिदिन लगभग 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है।

क्या है बुलंदशहर की गोमूत्र खरीद पहल?

बुलंदशहर में शुरू की गई पहल का उद्देश्य केवल गोमूत्र की खरीद-बिक्री करना नहीं बताया गया है, बल्कि इसे प्राकृतिक खेती से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, गांवों से गोमूत्र एकत्र कर उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपयोग में लाने की योजना है।

रिपोर्ट के अनुसार, करीब 15 गांव इस व्यवस्था से जुड़े हैं और रोजाना लगभग 500 लीटर गोमूत्र संग्रहित किया जा रहा है। इसके लिए 10 रुपये प्रति लीटर की खरीद दर बताई गई है। गोमूत्र उपलब्ध कराने वाले लोगों को प्रति लीटर 2 रुपये कमीशन दिए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

इस पहल को प्राकृतिक खेती के लिए उपयोगी इनपुट तैयार करने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। इसका एक उद्देश्य किसानों को रासायनिक कृषि इनपुट पर निर्भरता कम करने के लिए प्रोत्साहित करना भी बताया गया है।

अखिलेश यादव ने क्यों किया तंज?

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस खबर को साझा करते हुए अंग्रेजी में व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। उनका कहना था कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की दिशा में यह एक और कदम है और साथ ही उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि खरीदने वाले लोग भी कुछ खरीदेंगे।

अखिलेश यादव की टिप्पणी को राजनीतिक व्यंग्य के तौर पर देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी लगातार उत्तर प्रदेश सरकार की आर्थिक नीतियों और विकास के दावों पर सवाल उठाती रही है। ऐसे में गोमूत्र खरीदने की स्थानीय पहल को लेकर उनकी टिप्पणी भी उसी राजनीतिक बहस का हिस्सा दिखाई देती है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उपलब्ध रिपोर्ट में बुलंदशहर की इस पहल को स्थानीय स्तर पर संचालित व्यवस्था के रूप में बताया गया है। इसलिए इसे सीधे पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किसी राज्यव्यापी योजना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

प्राकृतिक खेती से जोड़ने की कोशिश

गोमूत्र और गोबर का इस्तेमाल पारंपरिक कृषि पद्धतियों में लंबे समय से होता रहा है। प्राकृतिक और जैविक खेती के समर्थक इनसे तैयार विभिन्न कृषि इनपुट को खेतों में इस्तेमाल करने की बात करते हैं।

बुलंदशहर की पहल में भी इसी तरह की सोच दिखाई देती है। यदि पशुपालकों को गोमूत्र से अतिरिक्त आय मिलती है, तो इससे पशुपालन की आर्थिक उपयोगिता बढ़ सकती है। साथ ही गोशालाओं और पशुपालकों के लिए ऐसे उत्पादों के व्यावसायिक उपयोग की संभावनाएं भी विकसित हो सकती हैं।

हालांकि, किसी भी कृषि मॉडल की सफलता केवल खरीद मूल्य तय करने से नहीं होती। इसके लिए संग्रह, भंडारण, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रसंस्करण, बाजार और किसानों तक उपयोगी उत्पाद पहुंचाने की पूरी व्यवस्था जरूरी होती है।

किसानों की आय से कितना जुड़ सकता है मामला?

पशुपालन करने वाले ग्रामीण परिवारों के लिए आम तौर पर दूध प्रमुख आय स्रोत होता है। लेकिन पशु से मिलने वाले अन्य उत्पादों का आर्थिक उपयोग बढ़ाया जाए तो आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार हो सकते हैं।

गोबर से जैविक खाद, बायोगैस और अन्य उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं पर देश के विभिन्न हिस्सों में काम हुआ है। उत्तर प्रदेश में भी पहले गोबर के व्यावसायिक उपयोग और उससे जुड़े मॉडल पर चर्चा होती रही है। उदाहरण के तौर पर 2022 में उत्तर प्रदेश में गोबर खरीद और उससे सीएनजी तैयार करने की योजनाओं को लेकर सरकारी स्तर पर बयान सामने आए थे।

इसी व्यापक संदर्भ में गोमूत्र की खरीद को भी देखा जा सकता है। यदि स्थानीय स्तर पर इसका संग्रह और प्रसंस्करण आर्थिक रूप से टिकाऊ साबित होता है, तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक छोटा लेकिन अतिरिक्त आय मॉडल विकसित हो सकता है।

‘ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ से जोड़ना कितना उचित?

अखिलेश यादव का ‘ट्रिलियन इकोनॉमी’ वाला तंज मूलतः राजनीतिक टिप्पणी है। किसी राज्य की अर्थव्यवस्था को ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक ले जाने के लिए कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र, निवेश, निर्यात, रोजगार, बुनियादी ढांचे और उत्पादकता जैसे अनेक क्षेत्रों में व्यापक वृद्धि आवश्यक होती है।

गोमूत्र जैसी स्थानीय कृषि गतिविधि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकती है, लेकिन अकेले ऐसी किसी पहल को पूरे राज्य की आर्थिक वृद्धि का प्रतिनिधि मानना सही नहीं होगा।

यही वजह है कि अखिलेश यादव का बयान आर्थिक नीति पर गंभीर विश्लेषण के बजाय राजनीतिक व्यंग्य के रूप में अधिक देखा जा रहा है।

गोवंश आधारित अर्थव्यवस्था की संभावनाएं

गोवंश से जुड़े उत्पादों का व्यावसायिक उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के वैकल्पिक अवसर पैदा कर सकता है। दूध के अलावा गोबर और गोमूत्र से खाद, जैविक कृषि इनपुट और कुछ अन्य उत्पाद तैयार करने के मॉडल अलग-अलग राज्यों में सामने आए हैं।

2017 में भी उत्तर प्रदेश में गोबर और गोमूत्र के उपयोग के जरिए गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर चर्चा हुई थी। उस समय राज्य गौ सेवा आयोग की ओर से गोबर और गोमूत्र के उपयोग को लेकर विभिन्न संभावनाओं का उल्लेख किया गया था।

इससे स्पष्ट है कि गोवंश से जुड़े अपशिष्ट को आर्थिक संसाधन में बदलने का विचार नया नहीं है। वर्तमान में चुनौती यह है कि ऐसे मॉडलों को वैज्ञानिक, पारदर्शी और आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए।

राजनीति बनाम आर्थिक प्रयोग

बुलंदशहर की गोमूत्र खरीद पहल पर शुरू हुई बहस में दो अलग-अलग पहलू दिखाई देते हैं। पहला पहलू ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक खेती से जुड़ा आर्थिक प्रयोग है, जबकि दूसरा राजनीतिक दलों के बीच विकास मॉडल को लेकर चलने वाला विवाद है।

सरकार या स्थानीय संस्थाएं यदि किसी उत्पाद की खरीद शुरू करती हैं तो उसका वास्तविक मूल्यांकन उसके परिणामों के आधार पर होना चाहिए। कितने किसानों को लाभ मिला, कितनी मात्रा में खरीद हुई, उत्पाद का आगे क्या उपयोग हुआ और किसानों की आय में कितना बदलाव आया—इन सवालों के जवाब इस मॉडल की सफलता को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगे।

आगे क्या होगा?

बुलंदशहर में शुरू हुई यह पहल यदि लंबे समय तक चलती है और किसानों को नियमित भुगतान तथा बाजार उपलब्ध होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक वैकल्पिक मॉडल बन सकती है। इसके लिए गुणवत्ता, संग्रह व्यवस्था और अंतिम उत्पाद की मांग सबसे महत्वपूर्ण कारक होंगे।

वहीं, राजनीतिक स्तर पर अखिलेश यादव की टिप्पणी ने इस स्थानीय पहल को व्यापक चर्चा जरूर दे दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित प्रशासन या सरकार इस पहल को किस रूप में प्रस्तुत करती है और क्या इसे भविष्य में अन्य क्षेत्रों तक विस्तार देने की कोई योजना बनती है।

निष्कर्ष

बुलंदशहर में 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने की खबर ने उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक खेती और राजनीति—तीनों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, पहल में 15 गांव जुड़े हैं और लगभग 500 लीटर प्रतिदिन संग्रह की बात सामने आई है।

अखिलेश यादव ने इसे ‘ट्रिलियन इकोनॉमी’ से जोड़कर सरकार पर व्यंग्य किया है। लेकिन इस पहल का वास्तविक महत्व राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा इस बात में तय होगा कि इससे पशुपालकों और किसानों को कितनी वास्तविक आर्थिक मदद मिलती है तथा प्राकृतिक खेती के लिए इसका कितना प्रभावी उपयोग हो पाता है।

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