कानपुर देहात में 108-102 एंबुलेंस सेवा पर उठे गंभीर सवाल, FIR के बाद भी कोऑर्डिनेटर के पद पर बने रहने से उठ रही जांच की मांग

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कानपुर देहात। जिले में संचालित 108 और 102 एंबुलेंस सेवाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। जीवन रक्षक मानी जाने वाली इस आपातकालीन सेवा के संचालन में कथित अनियमितताओं की जांच, प्राथमिकी और उसके बाद हुई विभागीय कार्रवाई को लेकर अब पारदर्शिता की मांग उठने लगी है। सबसे अधिक चर्चा इमरजेंसी मैनेजमेंट एग्जीक्यूटिव/कोऑर्डिनेटर अभिषेक तिवारी की भूमिका और उनके लंबे समय से जिले में बने रहने को लेकर हो रही है।

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बताया जा रहा है कि एंबुलेंस सेवा के संचालन से जुड़ी शिकायतों के बाद जिला प्रशासन की ओर से मामले की जांच कराई गई थी। जांच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर 30 अप्रैल 2026 को अकबरपुर कोतवाली में सेवा प्रदाता कंपनी से जुड़े अधिकारियों एवं कर्मचारियों सहित तत्कालीन प्रोग्राम मैनेजर प्रदीप पाठक और वर्तमान कोऑर्डिनेटर अभिषेक तिवारी के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था। हालांकि, प्राथमिकी दर्ज होने के कई महीने बाद भी अभिषेक तिवारी के उसी जिम्मेदारी पर बने रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

शिकायतों के बाद गठित हुई थी जांच टीम

सूत्रों के मुताबिक, एंबुलेंस सेवा के संचालन में लगातार मिल रही शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल सिंह के निर्देश पर जांच टीम गठित की गई थी। टीम में चिकित्सकों और उप जिलाधिकारियों को शामिल किए जाने की बात सामने आई है। जांच का उद्देश्य एंबुलेंस संचालन से संबंधित शिकायतों की वास्तविक स्थिति का परीक्षण करना और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाए तो उसकी जिम्मेदारी निर्धारित करना था।

जांच पूरी होने के बाद तैयार रिपोर्ट में 102 एंबुलेंस सेवा के संचालन में कई कथित अनियमितताओं का उल्लेख किए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर मामले को आगे बढ़ाया गया और तत्कालीन नोडल अधिकारी एवं डिप्टी सीएमओ डॉ. आदित्य सचान की ओर से अकबरपुर कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

हालांकि, किसी भी जांच रिपोर्ट या प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही माना जा सकता है। इसलिए मामले से जुड़े सभी पक्षों का सामने आना और निष्पक्ष जांच का पूरा होना महत्वपूर्ण है।

FIR के बाद कार्रवाई को लेकर सवाल

मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद सेवा प्रदाता कंपनी की ओर से तत्कालीन प्रोग्राम मैनेजर प्रदीप पाठक को जिले से हटाए जाने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, अभिषेक तिवारी के अब भी जिले में उसी जिम्मेदारी पर बने रहने से स्थानीय स्तर पर असमान कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

लोगों का कहना है कि यदि प्राथमिकी में कई जिम्मेदार लोगों का नाम शामिल है तो संबंधित सभी व्यक्तियों की भूमिका की समान रूप से समीक्षा होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ विभागीय स्तर पर कार्रवाई जरूरी नहीं मानी गई है, तो उसके पीछे का आधार भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।

यही वजह है कि अब प्रशासन और सेवा प्रदाता कंपनी से यह स्पष्ट करने की मांग उठ रही है कि प्राथमिकी के बाद कर्मचारियों की जिम्मेदारियों को लेकर क्या प्रक्रिया अपनाई गई और किन आधारों पर किसी कर्मचारी को पद पर बनाए रखने का निर्णय लिया गया।

दस वर्षों से जिले में तैनाती का दावा

अभिषेक तिवारी के संबंध में यह भी दावा किया जा रहा है कि वह करीब एक दशक से अधिक समय से कानपुर देहात में एंबुलेंस सेवा से जुड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यदि यह तथ्य आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होता है, तो लंबे समय तक एक ही जिले में एक ही प्रकार की जिम्मेदारी संभालने के कारण प्रशासनिक स्तर पर इसकी समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है।

आपातकालीन सेवाओं में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के संबंध में समय-समय पर स्थानांतरण और जिम्मेदारी में बदलाव की व्यवस्था पारदर्शिता तथा कार्यप्रणाली में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने के मामले में संबंधित विभाग से स्थिति स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा की जा रही है।

एंबुलेंस सेवा सीधे आम लोगों से जुड़ी

108 और 102 एंबुलेंस सेवाएं ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुर्घटना, गर्भवती महिलाओं की चिकित्सा आवश्यकता, गंभीर बीमारी अथवा अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में इन सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

ऐसी सेवा में यदि संचालन संबंधी कोई शिकायत सामने आती है तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है। इसलिए एंबुलेंस के संचालन, उपलब्धता, रिस्पॉन्स टाइम, कर्मचारियों की ड्यूटी, वाहनों के उपयोग और अन्य व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी जरूरी है।

इसी कारण कानपुर देहात में सामने आए इस प्रकरण को लेकर स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कराए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

शासन के नुमाइंदों की भूमिका पर भी नजर

मामले में स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि जब प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है तो संबंधित सेवा के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों ने आगे क्या कदम उठाए। क्या संबंधित कर्मचारी की भूमिका की विभागीय समीक्षा की गई? क्या कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा गया? क्या जांच पूरी होने तक जिम्मेदारी में बदलाव पर विचार किया गया? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी हैं।

प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई केवल आरोपों के आधार पर नहीं की जा सकती। लेकिन जहां गंभीर शिकायतें और प्राथमिकी मौजूद हों, वहां जांच की स्थिति और विभागीय निर्णयों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना जनता के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण होता है।

पारदर्शी जांच से ही दूर होंगे सवाल

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी पहलू निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच है। यदि जांच रिपोर्ट में किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है तो संबंधित नियमों के अनुसार विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप जांच में प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित व्यक्ति को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि 108-102 जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवा में किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह जांच की स्थिति, प्राथमिकी के बाद उठाए गए कदम और संबंधित कर्मचारियों की वर्तमान भूमिका के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराए।

फिलहाल इस प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद संबंधित कर्मचारियों को लेकर अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई क्यों हुई और लंबे समय से जिले में तैनाती के दावे की विभागीय स्तर पर क्या समीक्षा की गई। इन सवालों का जवाब जांच और संबंधित विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

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कानपुर देहात में 108-102 एंबुलेंस सेवा पर उठे गंभीर सवाल, FIR के बाद भी कोऑर्डिनेटर के पद पर बने रहने से उठ रही जांच की मांग

लेखक:हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क|प्रकाशित:अक्टूबर 4, 2026

कानपुर देहात। जिले में संचालित 108 और 102 एंबुलेंस सेवाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। जीवन रक्षक मानी जाने वाली इस आपातकालीन सेवा के संचालन में कथित अनियमितताओं की जांच, प्राथमिकी और उसके बाद हुई विभागीय कार्रवाई को लेकर अब पारदर्शिता की मांग उठने लगी है। सबसे अधिक चर्चा इमरजेंसी मैनेजमेंट एग्जीक्यूटिव/कोऑर्डिनेटर अभिषेक तिवारी की भूमिका और उनके लंबे समय से जिले में बने रहने को लेकर हो रही है।

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बताया जा रहा है कि एंबुलेंस सेवा के संचालन से जुड़ी शिकायतों के बाद जिला प्रशासन की ओर से मामले की जांच कराई गई थी। जांच के बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर 30 अप्रैल 2026 को अकबरपुर कोतवाली में सेवा प्रदाता कंपनी से जुड़े अधिकारियों एवं कर्मचारियों सहित तत्कालीन प्रोग्राम मैनेजर प्रदीप पाठक और वर्तमान कोऑर्डिनेटर अभिषेक तिवारी के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था। हालांकि, प्राथमिकी दर्ज होने के कई महीने बाद भी अभिषेक तिवारी के उसी जिम्मेदारी पर बने रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

शिकायतों के बाद गठित हुई थी जांच टीम

सूत्रों के मुताबिक, एंबुलेंस सेवा के संचालन में लगातार मिल रही शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल सिंह के निर्देश पर जांच टीम गठित की गई थी। टीम में चिकित्सकों और उप जिलाधिकारियों को शामिल किए जाने की बात सामने आई है। जांच का उद्देश्य एंबुलेंस संचालन से संबंधित शिकायतों की वास्तविक स्थिति का परीक्षण करना और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाए तो उसकी जिम्मेदारी निर्धारित करना था।

जांच पूरी होने के बाद तैयार रिपोर्ट में 102 एंबुलेंस सेवा के संचालन में कई कथित अनियमितताओं का उल्लेख किए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर मामले को आगे बढ़ाया गया और तत्कालीन नोडल अधिकारी एवं डिप्टी सीएमओ डॉ. आदित्य सचान की ओर से अकबरपुर कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

हालांकि, किसी भी जांच रिपोर्ट या प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही माना जा सकता है। इसलिए मामले से जुड़े सभी पक्षों का सामने आना और निष्पक्ष जांच का पूरा होना महत्वपूर्ण है।

FIR के बाद कार्रवाई को लेकर सवाल

मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद सेवा प्रदाता कंपनी की ओर से तत्कालीन प्रोग्राम मैनेजर प्रदीप पाठक को जिले से हटाए जाने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, अभिषेक तिवारी के अब भी जिले में उसी जिम्मेदारी पर बने रहने से स्थानीय स्तर पर असमान कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

लोगों का कहना है कि यदि प्राथमिकी में कई जिम्मेदार लोगों का नाम शामिल है तो संबंधित सभी व्यक्तियों की भूमिका की समान रूप से समीक्षा होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ विभागीय स्तर पर कार्रवाई जरूरी नहीं मानी गई है, तो उसके पीछे का आधार भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।

यही वजह है कि अब प्रशासन और सेवा प्रदाता कंपनी से यह स्पष्ट करने की मांग उठ रही है कि प्राथमिकी के बाद कर्मचारियों की जिम्मेदारियों को लेकर क्या प्रक्रिया अपनाई गई और किन आधारों पर किसी कर्मचारी को पद पर बनाए रखने का निर्णय लिया गया।

दस वर्षों से जिले में तैनाती का दावा

अभिषेक तिवारी के संबंध में यह भी दावा किया जा रहा है कि वह करीब एक दशक से अधिक समय से कानपुर देहात में एंबुलेंस सेवा से जुड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यदि यह तथ्य आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होता है, तो लंबे समय तक एक ही जिले में एक ही प्रकार की जिम्मेदारी संभालने के कारण प्रशासनिक स्तर पर इसकी समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है।

आपातकालीन सेवाओं में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के संबंध में समय-समय पर स्थानांतरण और जिम्मेदारी में बदलाव की व्यवस्था पारदर्शिता तथा कार्यप्रणाली में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने के मामले में संबंधित विभाग से स्थिति स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा की जा रही है।

एंबुलेंस सेवा सीधे आम लोगों से जुड़ी

108 और 102 एंबुलेंस सेवाएं ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुर्घटना, गर्भवती महिलाओं की चिकित्सा आवश्यकता, गंभीर बीमारी अथवा अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में इन सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

ऐसी सेवा में यदि संचालन संबंधी कोई शिकायत सामने आती है तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है। इसलिए एंबुलेंस के संचालन, उपलब्धता, रिस्पॉन्स टाइम, कर्मचारियों की ड्यूटी, वाहनों के उपयोग और अन्य व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी जरूरी है।

इसी कारण कानपुर देहात में सामने आए इस प्रकरण को लेकर स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कराए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

शासन के नुमाइंदों की भूमिका पर भी नजर

मामले में स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि जब प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है तो संबंधित सेवा के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों ने आगे क्या कदम उठाए। क्या संबंधित कर्मचारी की भूमिका की विभागीय समीक्षा की गई? क्या कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा गया? क्या जांच पूरी होने तक जिम्मेदारी में बदलाव पर विचार किया गया? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी हैं।

प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई केवल आरोपों के आधार पर नहीं की जा सकती। लेकिन जहां गंभीर शिकायतें और प्राथमिकी मौजूद हों, वहां जांच की स्थिति और विभागीय निर्णयों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना जनता के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण होता है।

पारदर्शी जांच से ही दूर होंगे सवाल

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी पहलू निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच है। यदि जांच रिपोर्ट में किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है तो संबंधित नियमों के अनुसार विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप जांच में प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित व्यक्ति को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि 108-102 जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवा में किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह जांच की स्थिति, प्राथमिकी के बाद उठाए गए कदम और संबंधित कर्मचारियों की वर्तमान भूमिका के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराए।

फिलहाल इस प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद संबंधित कर्मचारियों को लेकर अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई क्यों हुई और लंबे समय से जिले में तैनाती के दावे की विभागीय स्तर पर क्या समीक्षा की गई। इन सवालों का जवाब जांच और संबंधित विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।