नेतन्याहू का आइजेनकोट पर बड़ा राजनीतिक हमला, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगाए गंभीर आरोप
विशेषज्ञ राय: नेतन्याहू और गैडी आइजेनकोट के बीच बढ़ता राजनीतिक मुकाबला इजरायल की आगामी चुनावी राजनीति में सुरक्षा नीति को केंद्रीय मुद्दा बना सकता है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम दोनों नेताओं के लिए महत्वपूर्ण विषय है, लेकिन इसे लेकर उनके राजनीतिक दृष्टिकोण और रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई देता है। इसलिए नेतन्याहू की ओर से आइजेनकोट पर लगाए गए राजनीतिक आरोपों को चुनावी रणनीति के संदर्भ में देखना जरूरी है। आगामी चुनाव में मतदाताओं का रुख यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि इजरायल की सुरक्षा और विदेश नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

नई दिल्ली/तेल अवीव: इजरायल की राजनीति में आगामी चुनावों से पहले मुकाबला लगातार तेज होता जा रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व इजरायली सेना प्रमुख गैडी आइजेनकोट के बीच राजनीतिक टकराव अब राष्ट्रीय सुरक्षा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों तक पहुंच गया है। 11 अगस्त 2026 को नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए आइजेनकोट को लेकर तीखा राजनीतिक संदेश दिया। पोस्ट में आइजेनकोट की तस्वीर के साथ उन्हें इजरायल की सुरक्षा नीति के संदर्भ में निशाना बनाया गया।
हालांकि, नेतन्याहू की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार आइजेनकोट ईरान की परमाणु क्षमता को लेकर कठोर सुरक्षा रुख रखते हैं और उन्होंने ईरानी परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने की आवश्यकता पर सार्वजनिक रूप से जोर दिया है।
चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक गर्मी
इजरायल में अक्टूबर 2026 में आम चुनाव होने हैं और इस चुनाव में नेतन्याहू के सामने आइजेनकोट एक प्रमुख चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। हालिया राजनीतिक सर्वेक्षणों में आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की स्थिति मजबूत दिखाई गई है। एक ताजा सर्वेक्षण में विपक्षी खेमे को नेतन्याहू के गठबंधन से आगे बताया गया है।
यही वजह है कि दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक बयानबाजी अब केवल घरेलू मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है। ईरान, राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्ध नीति और इजरायल की भविष्य की दिशा चुनावी बहस के प्रमुख विषय बनते जा रहे हैं।
आइजेनकोट कोई सामान्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। वह इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ रह चुके हैं और लंबे सैन्य अनुभव के कारण सुरक्षा मामलों पर उनकी राय को विशेष महत्व दिया जाता है। हाल के महीनों में उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी याशर के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत चुनौती पेश की है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना मुख्य मुद्दा
इजरायल की राजनीति में ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से बेहद संवेदनशील विषय रहा है। नेतन्याहू वर्षों से यह रुख रखते आए हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
दूसरी ओर, आइजेनकोट ने भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को गंभीर सुरक्षा चुनौती बताया है। जुलाई 2026 में उनके एक बयान के संबंध में प्रकाशित फैक्ट-चेक सामग्री में कहा गया कि उन्होंने ईरानी परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने को प्राथमिकता बताया था और समृद्ध यूरेनियम के मुद्दे को महत्वपूर्ण माना था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि आइजेनकोट को केवल इस आधार पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का समर्थक बताना कि वह नेतन्याहू के राजनीतिक विरोधी हैं, एक जटिल विषय को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
नेतन्याहू बनाम आइजेनकोट की सीधी लड़ाई
आइजेनकोट के राजनीति में उभरने के साथ ही नेतन्याहू के सामने एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी आया है जिसकी पृष्ठभूमि सैन्य और सुरक्षा क्षेत्र से जुड़ी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आइजेनकोट अब नेतन्याहू को चुनौती देने वाले सबसे मजबूत नेताओं में शामिल हो गए हैं।
नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। उनके समर्थक राष्ट्रीय सुरक्षा और ईरान के खिलाफ कठोर नीति को उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। वहीं आइजेनकोट अपने सैन्य अनुभव और सुरक्षा मामलों की समझ के आधार पर मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में दोनों पक्ष एक-दूसरे की नीतियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
क्या आइजेनकोट वास्तव में ईरान को लेकर नरम हैं?
यह सवाल नेतन्याहू की ताजा राजनीतिक मुहिम के केंद्र में है। लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री इससे कहीं अधिक जटिल तस्वीर पेश करती है।
आइजेनकोट ने पहले भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को इजरायल के लिए गंभीर खतरा माना है। 2016 में इजरायली सेना के प्रमुख रहते हुए उन्होंने ईरान परमाणु समझौते को रणनीतिक मोड़ बताया था और उसके जोखिमों तथा संभावित अवसरों दोनों का उल्लेख किया था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने देने के पक्ष में हैं। बल्कि उनके सार्वजनिक बयानों से यह संकेत मिलता है कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े खतरे को अलग तरीके से संभालने की वकालत करते रहे हैं।
यही अंतर आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण हो सकता है—एक ओर नेतन्याहू की कठोर सुरक्षा और सैन्य दबाव की राजनीति है, तो दूसरी ओर आइजेनकोट सुरक्षा के साथ राजनीतिक और रणनीतिक विकल्पों पर जोर देते दिखाई देते हैं।
नेतन्याहू ने आइजेनकोट को बताया ‘लेफ्ट’
हालिया राजनीतिक बहस में नेतन्याहू ने आइजेनकोट को वामपंथी खेमे से जोड़ने की कोशिश की है। इजरायली राजनीति में यह आरोप अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुरक्षा और ईरान जैसे मुद्दों पर मतदाताओं का रुख काफी प्रभाव डाल सकता है।
एक हालिया विश्लेषण के अनुसार नेतन्याहू ने यह स्पष्ट किया है कि वह आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने के इच्छुक नहीं हैं और उन्हें राजनीतिक रूप से ‘लेफ्ट’ यानी वामपंथी धड़े से जोड़ते हैं।
हालांकि, आइजेनकोट की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह पारंपरिक वामपंथ के रूप में परिभाषित करना भी उचित नहीं होगा। उनकी राजनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य अनुभव और केंद्र की ओर झुकाव वाले मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश प्रमुख दिखाई देती है।
सर्वेक्षणों ने बढ़ाई नेतन्याहू की चिंता
आइजेनकोट के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत फिलहाल उनका बढ़ता जनसमर्थन माना जा रहा है। हालिया सर्वेक्षणों में उनके नेतृत्व वाले राजनीतिक खेमे को मजबूत स्थिति में दिखाया गया है। एक सर्वेक्षण में विपक्षी गठबंधन को नेतन्याहू के गठबंधन से लगभग 10 सीट आगे बताया गया।
हालांकि इजरायल की संसदीय व्यवस्था में केवल सबसे बड़ी पार्टी बनना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होता। किसी भी नेता को संसद में बहुमत के लिए सहयोगी दलों की आवश्यकता होती है। इसलिए चुनावी सर्वेक्षणों को अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता।
फिर भी इन आंकड़ों से इतना जरूर संकेत मिलता है कि आगामी चुनाव में नेतन्याहू को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
सुरक्षा नीति पर जनता का फैसला अहम
आगामी चुनाव में इजरायली मतदाताओं के सामने कई बड़े सवाल होंगे। ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा, क्षेत्रीय सुरक्षा, गाजा युद्ध के बाद की स्थिति, बंधकों का मुद्दा, अमेरिका के साथ संबंध और देश की आंतरिक राजनीति इनमें प्रमुख हैं।
नेतन्याहू अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को सुरक्षा के मुद्दे से जोड़ते रहे हैं। आइजेनकोट भी पूर्व सैन्य प्रमुख होने के कारण सुरक्षा क्षेत्र में अनुभव का दावा कर सकते हैं। इसलिए चुनावी मुकाबला केवल ‘दाएं बनाम बाएं’ की पारंपरिक लड़ाई नहीं रह सकता।
विशेषज्ञों के लिए भी चुनौतीपूर्ण मुकाबला
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में आइजेनकोट का उभार इजरायली राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। गैडी आइजेनकोट को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी काफी चर्चा हुई है और उन्हें नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया जा रहा है।
इस स्थिति में नेतन्याहू की ओर से आइजेनकोट की विचारधारा और ईरान नीति पर हमला चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। दूसरी तरफ आइजेनकोट के लिए चुनौती यह होगी कि वे सुरक्षा के मुद्दे पर अपनी विश्वसनीयता बनाए रखते हुए खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में स्थापित करें।
निष्कर्ष
11 अगस्त 2026 की नेतन्याहू की सोशल मीडिया पोस्ट को इजरायल की आगामी चुनावी राजनीति के व्यापक संदर्भ में देखना जरूरी है। यह केवल दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा नीति और भविष्य की दिशा को लेकर बड़ी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा है।
नेतन्याहू आइजेनकोट पर वैचारिक और सुरक्षा संबंधी सवाल उठाकर अपने समर्थक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं आइजेनकोट अपने सैन्य अनुभव और नई राजनीतिक पहचान के साथ सत्ता परिवर्तन की संभावना तलाश रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड आइजेनकोट को ईरान के परमाणु कार्यक्रम का समर्थक साबित नहीं करते। इसके विपरीत, उनके बयानों में ईरान की परमाणु क्षमता को खत्म करने की आवश्यकता पर जोर मिलता है।
अब देखना होगा कि चुनावी मैदान में सुरक्षा, ईरान और नेतन्याहू-विरोधी राजनीति में से कौन सा मुद्दा इजरायली मतदाताओं पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। अक्टूबर 2026 का चुनाव इस सवाल का राजनीतिक जवाब देने वाला अहम पड़ाव साबित हो सकता है।