राज्यसभा का सभापति कौन होता है? जानिए चुनाव, शक्तियां, कार्य और संवैधानिक भूमिका

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विशेषज्ञ राय: राज्यसभा का सभापति भारतीय संसदीय व्यवस्था में निष्पक्षता और अनुशासन बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है। चूंकि भारत का उपराष्ट्रपति पदेन राज्यसभा सभापति होता है, इसलिए सभापति की भूमिका सदन की कार्यवाही को संविधान और संसदीय नियमों के अनुरूप संचालित करने में अहम रहती है। विशेष रूप से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद के दौरान सभापति की निष्पक्षता लोकतांत्रिक संवाद को प्रभावी बनाए रखने में महत्वपूर्ण होती है।

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प्रस्तावना

भारत की संसद दो सदनों से मिलकर बनी है—लोकसभा और राज्यसभा। जहां लोकसभा को जनता का सदन कहा जाता है, वहीं राज्यसभा को राज्यों की परिषद कहा जाता है। राज्यसभा देश की विधायी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस सदन की कार्यवाही को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए एक संवैधानिक पद की व्यवस्था की गई है, जिसे राज्यसभा का सभापति (Chairman of Rajya Sabha) कहा जाता है।

भारत के संविधान के अनुसार भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। इसका अर्थ है कि उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का सभापति बनने के लिए अलग से चुनाव नहीं लड़ना पड़ता। जैसे ही कोई व्यक्ति भारत का उपराष्ट्रपति निर्वाचित होता है, वह राज्यसभा के सभापति का पद भी संभालता है।

राज्यसभा का सभापति कौन होता है?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 64 में स्पष्ट किया गया है कि भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होगा। इसलिए राज्यसभा के सभापति के पद पर अलग से किसी व्यक्ति का निर्वाचन नहीं होता।

वर्तमान व्यवस्था में उपराष्ट्रपति राज्यसभा की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं और सदन के संचालन में महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका निभाते हैं।

सभापति का मुख्य दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि राज्यसभा की कार्यवाही संविधान, नियमों और सदन की निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार चले।

उपराष्ट्रपति ही क्यों होते हैं सभापति?

संविधान निर्माताओं ने उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का सभापति बनाने के पीछे कई व्यावहारिक कारण देखे। राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसके सदस्यों का कार्यकाल अलग-अलग समय पर समाप्त होता रहता है। ऐसे में सदन की कार्यवाही के लिए एक संवैधानिक और अपेक्षाकृत निष्पक्ष पीठासीन अधिकारी की आवश्यकता होती है।

उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का सभापति बनाने से इस पद को संवैधानिक महत्व मिलता है। साथ ही, सभापति स्वयं राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य नहीं होते, जिससे उनसे सदन की कार्यवाही में निष्पक्षता बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।

राज्यसभा के सभापति का चुनाव कैसे होता है?

यह समझना महत्वपूर्ण है कि सभापति का अलग से चुनाव नहीं होता। भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव होता है और वही व्यक्ति राज्यसभा का पदेन सभापति बन जाता है।

उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। चुनाव में एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote) और गुप्त मतदान का प्रावधान है।

उपराष्ट्रपति का कार्यकाल सामान्यतः पांच वर्ष का होता है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी वह तब तक पद पर बने रह सकते हैं, जब तक नया उपराष्ट्रपति पद ग्रहण नहीं कर लेता।

सभापति की प्रमुख शक्तियां

राज्यसभा के सभापति के पास सदन की कार्यवाही को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए कई महत्वपूर्ण शक्तियां होती हैं।

1. सदन की बैठक की अध्यक्षता

सभापति राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं। सदन में चर्चा, बहस और अन्य संसदीय कार्यवाही को निर्धारित नियमों के अनुसार आगे बढ़ाना उनकी प्रमुख जिम्मेदारी है।

2. सदन में अनुशासन बनाए रखना

सभापति यह सुनिश्चित करते हैं कि सदस्य सदन की मर्यादा और नियमों का पालन करें। यदि कोई सदस्य निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करता है, तो सभापति नियमों के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं।

3. बोलने की अनुमति देना

राज्यसभा में कौन-सा सदस्य कब बोल सकता है, इसका संचालन सभापति करते हैं। सदन की कार्यवाही में बोलने के लिए सदस्य को सभापति की अनुमति लेनी होती है।

4. नियमों की व्याख्या

संसदीय नियमों की व्याख्या करने में सभापति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी प्रक्रिया को लेकर सदन में भ्रम या विवाद हो, तो सभापति नियमों के आधार पर निर्णय देते हैं।

5. व्यवस्था बनाए रखना

सदन में यदि हंगामा या अव्यवस्था उत्पन्न होती है, तो सभापति कार्यवाही को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक संसदीय कदम उठा सकते हैं। उनका उद्देश्य सदन की कार्यवाही को सुचारु बनाए रखना होता है।

क्या सभापति वोट कर सकते हैं?

राज्यसभा के सभापति को सामान्य परिस्थितियों में मतदान करने का अधिकार नहीं होता, क्योंकि वे राज्यसभा के सदस्य नहीं होते। हालांकि, मतों की बराबरी होने की स्थिति में सभापति निर्णायक मत (Casting Vote) दे सकते हैं।

यह प्रावधान सभापति की निष्पक्ष भूमिका को बनाए रखने के साथ-साथ गतिरोध की स्थिति में निर्णय लेने का संवैधानिक रास्ता उपलब्ध कराता है।

सभापति और उपसभापति में अंतर

राज्यसभा में सभापति और उपसभापति अलग-अलग पद हैं।

सभापति:
भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।

उपसभापति:
राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक सदस्य को उपसभापति चुनती है। उपसभापति सभापति की अनुपस्थिति में सदन की अध्यक्षता करते हैं।

इस प्रकार सभापति राज्यसभा के बाहर से आने वाला संवैधानिक पद है, जबकि उपसभापति राज्यसभा के सदस्यों में से चुना जाता है।

सभापति की अनुपस्थिति में क्या होता है?

यदि उपराष्ट्रपति किसी कारण से राज्यसभा की बैठक में उपस्थित नहीं हैं, तो उपसभापति सदन की अध्यक्षता कर सकते हैं। यदि उपसभापति का पद भी खाली हो, तो राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अनुसार कोई अन्य सदस्य सभापति के कार्यों का निर्वहन कर सकता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्यसभा की कार्यवाही किसी भी परिस्थिति में अनावश्यक रूप से बाधित न हो।

सभापति को हटाया कैसे जा सकता है?

चूंकि राज्यसभा का सभापति भारत का उपराष्ट्रपति होता है, इसलिए उसे सभापति के पद से अलग करके हटाने की प्रक्रिया नहीं होती। यदि उपराष्ट्रपति अपने पद से हटते हैं, तो राज्यसभा के सभापति का पद भी समाप्त हो जाता है।

संविधान के अनुसार उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए राज्यसभा में एक प्रस्ताव पारित किया जाता है, जिसे लोकसभा की सहमति भी प्राप्त करनी होती है। इसके लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

सभापति की निष्पक्षता क्यों महत्वपूर्ण है?

राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्यों का प्रतिनिधित्व होता है। कई बार सरकार और विपक्ष के बीच किसी मुद्दे पर तीखी बहस हो सकती है। ऐसे वातावरण में सभापति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

सभापति से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं, बल्कि संसदीय नियमों और संविधान के अनुसार सदन का संचालन करें। सदन में सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर देना और संसदीय मर्यादा बनाए रखना उनके प्रमुख दायित्वों में शामिल है।

राज्यसभा के लिए सभापति का महत्व

राज्यसभा एक स्थायी सदन है। यह कभी भंग नहीं होती। इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य आते हैं। ऐसी निरंतर चलने वाली संस्था में कार्यवाही को व्यवस्थित रखने के लिए एक मजबूत पीठासीन व्यवस्था आवश्यक है।

सभापति सदन में चर्चा को नियमों के अनुसार संचालित करने, सदस्यों के अधिकारों और संसदीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाने तथा कार्यवाही को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

राज्यसभा के सभापति से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं—

  • राज्यसभा का सभापति कौन होता है? भारत का उपराष्ट्रपति।
  • सभापति का पद किस प्रकार का है? पदेन पद।
  • क्या सभापति राज्यसभा का सदस्य होता है? नहीं।
  • सभापति का संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 64।
  • उपराष्ट्रपति का कार्यकाल: सामान्यतः पांच वर्ष।
  • राज्यसभा का उपसभापति कौन चुनता है? राज्यसभा के सदस्य।
  • सभापति सामान्यतः वोट करते हैं? नहीं।
  • मत बराबर होने पर: सभापति निर्णायक मत दे सकते हैं।
  • सभापति की अनुपस्थिति में: उपसभापति सदन की अध्यक्षता करते हैं।
  • राज्यसभा: संसद का उच्च सदन और स्थायी सदन है।

निष्कर्ष

राज्यसभा का सभापति भारतीय संसदीय व्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है। भारत का उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। सभापति का काम केवल सदन की बैठक की अध्यक्षता करना नहीं है, बल्कि संसदीय नियमों का पालन सुनिश्चित करना, बहस को व्यवस्थित रखना, सदन में अनुशासन बनाए रखना और निष्पक्ष तरीके से कार्यवाही संचालित करना भी है।

राज्यसभा में देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हितों से जुड़े विषयों पर चर्चा होती है। ऐसे में सभापति की निष्पक्षता और संसदीय नियमों की समझ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इसीलिए भारतीय संविधान ने उपराष्ट्रपति को राज्यसभा के सभापति का पदेन दायित्व सौंपकर इस संस्था को एक मजबूत संवैधानिक आधार प्रदान किया है।

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