लद्दाख की पुकार: राहुल गांधी की चेतावनी और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

लद्दाख के लेह में एक सैनिक की संदिग्ध मृत्यु ने न केवल वहां के समाज को झकझोर दिया है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस घटना को केंद्र में रखते हुए सरकार से सीधे सवाल किए और संवाद की राह अपनाने का आग्रह किया।
🗣️ संवाद की संस्कृति बनाम भय की राजनीति
राहुल गांधी का कहना है कि लोकतंत्र का आधार आपसी बातचीत और भरोसे पर टिका होता है, न कि भय और हिंसा पर। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि लद्दाख के लोगों की आवाज़ सुनी जाए और उनके साथ भरोसेमंद संवाद स्थापित किया जाए। साथ ही उन्होंने मृतक सैनिक की घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की, ताकि सच्चाई सामने आ सके और पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके।
📌 छठी अनुसूची और लद्दाख की पहचान
गांधी ने एक बार फिर लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग दोहराई। अनुच्छेद 244(2) और 275(1) के तहत आने वाली यह व्यवस्था आदिवासी और विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्रों को संवैधानिक सुरक्षा और स्वायत्तता प्रदान करती है। उनके अनुसार, लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियाँ और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए यह कदम आवश्यक है।
⚖️ भाजपा पर सीधा प्रहार
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि भाजपा लद्दाख में डर और दमन का वातावरण बनाकर शासन कर रही है। उनके अनुसार यह नीति न केवल लोकतांत्रिक आदर्शों के विपरीत है, बल्कि देश की अखंडता के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सत्ता का स्थायित्व संवाद से आता है, न कि कठोर नियंत्रण से।
🔎 निष्कर्ष: लोकतांत्रिक परीक्षा का क्षण
यह स्पष्ट है कि लद्दाख आज लोकतंत्र की एक अहम परीक्षा बन गया है। वहां के लोग लंबे समय से अपनी पहचान, अधिकार और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राहुल गांधी की अपील केवल राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को बचाने की पुकार है। यदि केंद्र सरकार इस चुनौती को अवसर में बदलकर बातचीत और न्याय का रास्ता अपनाती है, तो यह पूरे देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को और सशक्त करने का उदाहरण बनेगा।
