माघ मेले में नेताजी की प्रतिमा पर संग्राम: आस्था, परंपरा और सत्ता की रस्साकशी

प्रयागराज का माघ मेला, जो वर्षों से सनातन आस्था और साधना का केंद्र रहा है, इस बार राजनीति के कारण सुर्खियों में आ गया है। समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की प्रतिमा स्थापना को लेकर उपजा विवाद अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह गया, बल्कि यह भावनाओं, परंपराओं और राजनीतिक टकराव का प्रतीक बन गया है।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
बीते वर्ष महाकुंभ के दौरान संगम क्षेत्र में मुलायम सिंह यादव की प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति दी गई थी। उस समय यह कदम नेताजी के सामाजिक योगदान के सम्मान के रूप में देखा गया। लेकिन इस वर्ष माघ मेले में उसी परंपरा को दोहराने की कोशिश पर प्रशासन ने आपत्ति जताते हुए नोटिस जारी कर दिया।
प्रशासन का तर्क है कि माघ मेला विशुद्ध धार्मिक आयोजन है और यहां किसी राजनीतिक व्यक्तित्व की प्रतिमा स्थापित करना मेले की प्रकृति के विपरीत है।
अखिलेश यादव का तीखा प्रतिकार
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस फैसले को दोहरे मापदंडों का उदाहरण बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पिछले आयोजन में अनुमति दी गई थी, तो इस बार प्रतिबंध क्यों?
उनके अनुसार यह निर्णय केवल नियमों की आड़ में लिया गया राजनीतिक कदम है, जो श्रद्धा और जनभावनाओं की अनदेखी करता है। अखिलेश यादव का बयान सपा समर्थकों के बीच आक्रोश का कारण बन गया है।
प्रशासन और साधु-संतों की आपत्ति
मेला प्रशासन का कहना है कि कई संत-महात्माओं ने प्रतिमा स्थापना पर असहमति जताई है। उनका मानना है कि माघ मेला तप, संयम और अध्यात्म से जुड़ा आयोजन है, जिसे राजनीतिक प्रतीकों से दूर रखा जाना चाहिए। इसी आधार पर संबंधित संस्था को नोटिस भेजा गया।
सामाजिक समीकरणों पर असर
यह मुद्दा अब केवल एक मूर्ति तक सीमित नहीं रहा। सपा इसे PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज के सम्मान से जोड़कर देख रही है। पार्टी का दावा है कि नेताजी ने हमेशा इन वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और उनकी स्मृति को सार्वजनिक आयोजन से अलग करना उन समुदायों की भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है।
दूसरी ओर, विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश बता रहा है।
निष्कर्ष
माघ मेला विवाद इस सवाल को जन्म देता है कि क्या सामाजिक योगदान देने वाले राजनीतिक नेताओं की स्मृति को धार्मिक आयोजनों से पूरी तरह अलग रखा जा सकता है?
यह मामला अब श्रद्धा बनाम व्यवस्था, सम्मान बनाम नियम और भावना बनाम सत्ता की बहस में बदल चुका है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह टकराव संवाद और संतुलन से सुलझेगा या राजनीति की धार इसे और तीखा बनाएगी।
