फ़रवरी 12, 2026

भारत और कनाडा के बीच राजनयिक विवाद: मोदी और ट्रूडो को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ, लेकिन संबंधों में तनाव

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हाल ही में भारत और कनाडा के बीच शीर्ष राजनयिकों को निष्कासित किए जाने से दोनों देशों के बीच रिश्ते नए निम्न स्तर पर पहुंच गए हैं, लेकिन यह तनाव अल्पकालिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कनाडाई समकक्ष जस्टिन ट्रूडो के लिए राजनीतिक लाभ ला सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह अभूतपूर्व राजनयिक विवाद दोनों नेताओं की घरेलू छवि को मजबूती दे सकता है, जो अपनी-अपनी तीसरी अवधि में राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

सोमवार को कनाडा ने भारत के छह राजनयिकों को निष्कासित कर दिया, यह आरोप लगाते हुए कि वे कनाडा में एक सिख अलगाववादी नेता की हत्या में शामिल थे। कनाडा सरकार ने भारत पर यह भी आरोप लगाया कि वह कनाडा में रहने वाले भारतीय असंतुष्टों को निशाना बनाने का प्रयास कर रही है। इसके जवाब में भारत ने भी कनाडा के छह राजनयिकों को देश छोड़ने का आदेश दिया। इस राजनयिक तनाव ने दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा और शिक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी और ट्रूडो दोनों इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपने दृढ़ रुख के लिए पहचाने जाने वाले नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता की बन सकती है, जो विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ भारत की संप्रभुता की रक्षा करते हैं। भारत के पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा, “लोग देखेंगे कि भारत सरकार एक विकसित देश द्वारा लगाए गए दबाव और जबरन उपायों के खिलाफ खड़ी है। जनता प्रधानमंत्री मोदी और सरकार का दृढ़ समर्थन करेगी।”

वहीं, कनाडा में ट्रूडो, जो कई मुद्दों पर आलोचना का सामना कर रहे हैं, जैसे कि महंगाई और जनता में असंतोष, इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाकर अपने समर्थकों के बीच सहानुभूति हासिल कर सकते हैं। कनाडा में सिख समुदाय के समर्थन में ट्रूडो की आवाज और मानवाधिकारों के मुद्दे पर उनका सख्त रुख कुछ वोटरों को आकर्षित कर सकता है, खासकर चुनावी मौसम के करीब आते समय।

भारत-कनाडा संबंध: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत और कनाडा के बीच संबंध दशकों से जटिल रहे हैं, जिनमें सहयोग और तनाव दोनों शामिल रहे हैं। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए। शुरुआत में, दोनों देशों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण थे, जिनमें लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रमंडल के जुड़ाव का महत्वपूर्ण योगदान था।

हालांकि, 1980 के दशक में खालिस्तान अलगाववादी आंदोलन के उदय के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गया। कनाडा सिख प्रवासी समुदायों का एक प्रमुख केंद्र बन गया, जिनमें से कुछ ने खालिस्तान आंदोलन का समर्थन किया, जिससे भारत के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए। 1985 में एयर इंडिया फ्लाइट 182 की बमबारी, जिसमें 329 लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे, ने संबंधों को और जटिल बना दिया। इस हमले का संबंध खालिस्तानी चरमपंथियों से था, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास की स्थिति बनी रही।

इन तनावों के बावजूद, भारत और कनाडा ने व्यापार, शिक्षा और ऊर्जा जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बनाए रखा। हाल के वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार ने नई ऊंचाइयां छुईं, और कनाडा भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का एक प्रमुख गंतव्य बन गया। कनाडा के विशाल प्राकृतिक संसाधन, जैसे तेल और यूरेनियम, दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के प्रमुख क्षेत्र रहे हैं।

2000 के दशक की शुरुआत में दोनों देशों के संबंधों में कुछ सुधार देखने को मिला, जिसमें उच्च स्तरीय यात्राएं और बढ़ा हुआ आर्थिक सहयोग शामिल था। लेकिन सिख अलगाववाद का मुद्दा समय-समय पर संबंधों पर छाया रहता है, जैसा कि वर्तमान विवाद में भी देखा जा सकता है।

आगे का रास्ता: भारत-कनाडा संबंधों का अनिश्चित भविष्य

हालिया राजनयिक निष्कासन और कनाडा द्वारा लगाए गए व्यापक आरोपों ने लंबे समय से चले आ रहे तनावों को सतह पर ला दिया है। जहां मोदी और ट्रूडो को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ मिल सकता है, वहीं दीर्घकालिक प्रभाव भारत-कनाडा संबंधों पर गंभीर हो सकता है। दोनों देशों को इन तनावों को सावधानीपूर्वक संभालने की आवश्यकता होगी ताकि व्यापार, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में वर्षों की प्रगति खतरे में न पड़े।

यह देखना बाकी है कि यह राजनयिक विवाद और अधिक बढ़ेगा या दोनों पक्ष सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास करेंगे। दोनों देशों के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वे इस स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाने से रोकें, क्योंकि व्यापार, पर्यटन और शिक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों की भलाई जुड़ी हुई है।

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