त्योहारी मौसम से पहले खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती, उपभोक्ताओं को राहत की उम्मीद

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नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026। देश में त्योहारी मौसम की शुरुआत से पहले खाद्य तेलों की बढ़ती लागत को नियंत्रित करने की दिशा में केंद्र सरकार ने आयात शुल्क में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सरकार ने प्रमुख कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी यानी मूल सीमा शुल्क को कम करने का फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया है, जबकि कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम तेल पर यह शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है।

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सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर बढ़ते दबाव को कम करना, उपभोक्ताओं को राहत देना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे होते खाद्य तेलों के कारण पैदा हुए मुद्रास्फीति संबंधी दबाव को नियंत्रित करना है। आयात शुल्क में कमी से विदेशों से आने वाले कच्चे खाद्य तेल की लागत घटने की संभावना है, जिसका असर आगे चलकर घरेलू बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

सूरजमुखी तेल पर शुल्क हुआ शून्य

नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव कच्चे सूरजमुखी तेल को लेकर किया गया है। इसका बेसिक कस्टम ड्यूटी अब शून्य यानी Nil कर दिया गया है। इससे आयातकों के लिए कच्चे सूरजमुखी तेल की शुरुआती लागत में कमी आ सकती है।

सूरजमुखी तेल भारत में घरेलू रसोई में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख खाद्य तेलों में शामिल है। इसकी कीमतों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों का प्रभाव दिखाई देता है। ऐसे में आयात शुल्क घटने से आयात लागत पर कुछ दबाव कम हो सकता है।

हालांकि, केवल सीमा शुल्क में कटौती से खुदरा बाजार में कीमतों में तत्काल और समान अनुपात में कमी आना जरूरी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें, समुद्री मालभाड़ा, मुद्रा विनिमय दर, आयात की मात्रा, घरेलू मांग और कंपनियों की लागत जैसे कई अन्य कारक भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।

पाम और सोयाबीन तेल पर भी राहत

केंद्र सरकार ने कच्चे पाम तेल और कच्चे सोयाबीन तेल के लिए भी बेसिक कस्टम ड्यूटी में कमी की है। दोनों पर पहले 10 प्रतिशत मूल सीमा शुल्क लागू था, जिसे घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है।

पाम और सोयाबीन तेल भारतीय खाद्य तेल बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बदलाव का सीधा या अप्रत्यक्ष प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल में अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल कीमतों में वृद्धि ने भारतीय बाजार में भी लागत का दबाव बढ़ाया था।

सरकार ने इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए आयात शुल्क की संरचना में बदलाव किया है। सरकारी बयान के मुताबिक, शुल्क में यह बदलाव घरेलू खाद्य तेल की कीमतों को नियंत्रित करने और महंगाई के दबाव को कम करने के उद्देश्य से किया गया है।

कच्चे और रिफाइंड तेल के बीच अंतर बरकरार

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने कच्चे और परिष्कृत यानी रिफाइंड खाद्य तेलों के बीच 19.25 प्रतिशत का आयात शुल्क अंतर बनाए रखा है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य देश में घरेलू रिफाइनिंग गतिविधियों को प्रोत्साहन देना है।

कच्चा तेल आयात करके देश के भीतर उसकी प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग की जाती है। यदि कच्चे तेल पर शुल्क अपेक्षाकृत कम और रिफाइंड तेल पर अधिक रखा जाता है, तो घरेलू रिफाइनिंग उद्योग के लिए आयातित कच्चे माल को भारत में प्रोसेस करने का आर्थिक आधार बना रह सकता है।

इस व्यवस्था का एक व्यापक उद्देश्य यह भी है कि भारत केवल तैयार रिफाइंड तेल के आयात पर निर्भर न रहे, बल्कि देश के भीतर तेल प्रसंस्करण और उससे जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों को बनाए रखा जा सके।

त्योहारी मांग के बीच क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?

सितंबर से नवंबर के बीच भारत में त्योहारों का मौसम रहता है। इस अवधि में घरों में खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ने के साथ खाना पकाने के तेल की मांग में भी वृद्धि हो सकती है। ऐसे समय में खाद्य तेल की कीमतों में तेजी घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

इसी वजह से सरकार का यह फैसला बाजार और उपभोक्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि आयात लागत में कमी का लाभ बाजार तक पहुंचता है, तो आने वाले समय में थोक और खुदरा स्तर पर कीमतों में नरमी देखने को मिल सकती है।

हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार की दिशा और घरेलू आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा। सरकार ने अपने फैसले में अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल कीमतों में हालिया वृद्धि और उसके घरेलू लागत तथा खुदरा कीमतों पर प्रभाव को ध्यान में रखने की बात कही है।

उपभोक्ताओं पर संभावित असर

खाद्य तेल आम परिवारों की नियमित जरूरत का हिस्सा है। इसलिए इसकी कीमत में मामूली बदलाव भी मासिक घरेलू खर्च को प्रभावित कर सकता है। आयात शुल्क में कटौती का उद्देश्य आयातित तेल की लागत को कम करना है, जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन उपभोक्ताओं को मिलने वाली वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि आयात लागत में कमी कितनी तेजी से खुदरा बाजार तक पहुंचती है। इसके लिए आयातकों, रिफाइनरों, थोक विक्रेताओं और खुदरा कारोबारियों की कीमत निर्धारण प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।

सरकार ने पहले भी खाद्य तेलों की कीमतों में राहत सुनिश्चित करने के लिए उद्योग संगठनों के साथ समन्वय किया है। जून 2025 में भी केंद्र ने प्रमुख कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत की थी और घरेलू रिफाइनिंग को प्रोत्साहित करने के लिए कच्चे तथा रिफाइंड तेलों के बीच शुल्क अंतर को बढ़ाया था।

घरेलू किसानों के लिए क्या मायने हैं?

खाद्य तेलों की आयात शुल्क नीति का प्रभाव केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहता। इसका संबंध घरेलू तिलहन किसानों और उनकी उपज की कीमतों से भी होता है। जब विदेशों से सस्ता तेल बड़ी मात्रा में उपलब्ध होता है, तो घरेलू तिलहन की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

यही वजह है कि सरकार को एक ओर उपभोक्ताओं के लिए खाद्य तेल सस्ता रखने और दूसरी ओर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। वर्ष 2024 में सरकार ने घरेलू तिलहन किसानों को समर्थन देने के उद्देश्य से खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाया था। उस समय सरकार ने कहा था कि सस्ते आयात से घरेलू सोयाबीन जैसी फसलों की कीमतों पर दबाव पड़ रहा था।

मौजूदा फैसला इस नीति के दूसरे पहलू को दर्शाता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के समय उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले बोझ को कम करने पर जोर दिया गया है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार की भूमिका अहम

भारत के खाद्य तेल बाजार पर वैश्विक कीमतों का प्रभाव काफी महत्वपूर्ण है। पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के अंतरराष्ट्रीय उत्पादन, मौसम, निर्यात नीति, परिवहन लागत और वैश्विक मांग में बदलाव से भारतीय बाजार की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।

इसलिए आयात शुल्क में कटौती घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने का एक उपाय है, लेकिन यह अकेला कारक नहीं है। यदि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो शुल्क में कमी का लाभ सीमित हो सकता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय कीमतें स्थिर या नरम रहती हैं तो शुल्क कटौती का असर अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।

बाजार में आगे क्या देखने को मिलेगा?

अब नजर इस बात पर रहेगी कि आयातक और खाद्य तेल कंपनियां शुल्क में कमी का लाभ किस हद तक बाजार में स्थानांतरित करती हैं। साथ ही, आने वाले त्योहारी दिनों में मांग और अंतरराष्ट्रीय कीमतों की दिशा भी महत्वपूर्ण होगी।

कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी शून्य होने और पाम तथा सोयाबीन तेल पर इसे 5 प्रतिशत किए जाने से आयात लागत की संरचना में बदलाव आया है। सरकार ने साथ ही कच्चे और रिफाइंड तेल के बीच 19.25 प्रतिशत का अंतर बनाए रखा है, जिससे घरेलू रिफाइनिंग को समर्थन देने की नीति भी जारी रहती है।

कुल मिलाकर, केंद्र का यह कदम खाद्य तेलों की बढ़ती लागत और त्योहारी मौसम में संभावित अतिरिक्त मांग के बीच बाजार पर दबाव कम करने की कोशिश के रूप में सामने आया है। इसका अंतिम लाभ उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचता है, यह आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय कीमतों, आयात लागत, घरेलू मांग और बाजार में कीमतों के समायोजन पर निर्भर करेगा।

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त्योहारी मौसम से पहले खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती, उपभोक्ताओं को राहत की उम्मीद
दिनांक: 25 सितम्बर, 2026
रिपोर्ट: हिट एंड हॉट न्यूज़ डेस्क

नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026। देश में त्योहारी मौसम की शुरुआत से पहले खाद्य तेलों की बढ़ती लागत को नियंत्रित करने की दिशा में केंद्र सरकार ने आयात शुल्क में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सरकार ने प्रमुख कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी यानी मूल सीमा शुल्क को कम करने का फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया है, जबकि कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम तेल पर यह शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है।

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सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर बढ़ते दबाव को कम करना, उपभोक्ताओं को राहत देना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे होते खाद्य तेलों के कारण पैदा हुए मुद्रास्फीति संबंधी दबाव को नियंत्रित करना है। आयात शुल्क में कमी से विदेशों से आने वाले कच्चे खाद्य तेल की लागत घटने की संभावना है, जिसका असर आगे चलकर घरेलू बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

सूरजमुखी तेल पर शुल्क हुआ शून्य

नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव कच्चे सूरजमुखी तेल को लेकर किया गया है। इसका बेसिक कस्टम ड्यूटी अब शून्य यानी Nil कर दिया गया है। इससे आयातकों के लिए कच्चे सूरजमुखी तेल की शुरुआती लागत में कमी आ सकती है।

सूरजमुखी तेल भारत में घरेलू रसोई में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख खाद्य तेलों में शामिल है। इसकी कीमतों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों का प्रभाव दिखाई देता है। ऐसे में आयात शुल्क घटने से आयात लागत पर कुछ दबाव कम हो सकता है।

हालांकि, केवल सीमा शुल्क में कटौती से खुदरा बाजार में कीमतों में तत्काल और समान अनुपात में कमी आना जरूरी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें, समुद्री मालभाड़ा, मुद्रा विनिमय दर, आयात की मात्रा, घरेलू मांग और कंपनियों की लागत जैसे कई अन्य कारक भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।

पाम और सोयाबीन तेल पर भी राहत

केंद्र सरकार ने कच्चे पाम तेल और कच्चे सोयाबीन तेल के लिए भी बेसिक कस्टम ड्यूटी में कमी की है। दोनों पर पहले 10 प्रतिशत मूल सीमा शुल्क लागू था, जिसे घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है।

पाम और सोयाबीन तेल भारतीय खाद्य तेल बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बदलाव का सीधा या अप्रत्यक्ष प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल में अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल कीमतों में वृद्धि ने भारतीय बाजार में भी लागत का दबाव बढ़ाया था।

सरकार ने इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए आयात शुल्क की संरचना में बदलाव किया है। सरकारी बयान के मुताबिक, शुल्क में यह बदलाव घरेलू खाद्य तेल की कीमतों को नियंत्रित करने और महंगाई के दबाव को कम करने के उद्देश्य से किया गया है।

कच्चे और रिफाइंड तेल के बीच अंतर बरकरार

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार ने कच्चे और परिष्कृत यानी रिफाइंड खाद्य तेलों के बीच 19.25 प्रतिशत का आयात शुल्क अंतर बनाए रखा है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य देश में घरेलू रिफाइनिंग गतिविधियों को प्रोत्साहन देना है।

कच्चा तेल आयात करके देश के भीतर उसकी प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग की जाती है। यदि कच्चे तेल पर शुल्क अपेक्षाकृत कम और रिफाइंड तेल पर अधिक रखा जाता है, तो घरेलू रिफाइनिंग उद्योग के लिए आयातित कच्चे माल को भारत में प्रोसेस करने का आर्थिक आधार बना रह सकता है।

इस व्यवस्था का एक व्यापक उद्देश्य यह भी है कि भारत केवल तैयार रिफाइंड तेल के आयात पर निर्भर न रहे, बल्कि देश के भीतर तेल प्रसंस्करण और उससे जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों को बनाए रखा जा सके।

त्योहारी मांग के बीच क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?

सितंबर से नवंबर के बीच भारत में त्योहारों का मौसम रहता है। इस अवधि में घरों में खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ने के साथ खाना पकाने के तेल की मांग में भी वृद्धि हो सकती है। ऐसे समय में खाद्य तेल की कीमतों में तेजी घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

इसी वजह से सरकार का यह फैसला बाजार और उपभोक्ताओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि आयात लागत में कमी का लाभ बाजार तक पहुंचता है, तो आने वाले समय में थोक और खुदरा स्तर पर कीमतों में नरमी देखने को मिल सकती है।

हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार की दिशा और घरेलू आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा। सरकार ने अपने फैसले में अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल कीमतों में हालिया वृद्धि और उसके घरेलू लागत तथा खुदरा कीमतों पर प्रभाव को ध्यान में रखने की बात कही है।

उपभोक्ताओं पर संभावित असर

खाद्य तेल आम परिवारों की नियमित जरूरत का हिस्सा है। इसलिए इसकी कीमत में मामूली बदलाव भी मासिक घरेलू खर्च को प्रभावित कर सकता है। आयात शुल्क में कटौती का उद्देश्य आयातित तेल की लागत को कम करना है, जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन उपभोक्ताओं को मिलने वाली वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि आयात लागत में कमी कितनी तेजी से खुदरा बाजार तक पहुंचती है। इसके लिए आयातकों, रिफाइनरों, थोक विक्रेताओं और खुदरा कारोबारियों की कीमत निर्धारण प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।

सरकार ने पहले भी खाद्य तेलों की कीमतों में राहत सुनिश्चित करने के लिए उद्योग संगठनों के साथ समन्वय किया है। जून 2025 में भी केंद्र ने प्रमुख कच्चे खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत की थी और घरेलू रिफाइनिंग को प्रोत्साहित करने के लिए कच्चे तथा रिफाइंड तेलों के बीच शुल्क अंतर को बढ़ाया था।

घरेलू किसानों के लिए क्या मायने हैं?

खाद्य तेलों की आयात शुल्क नीति का प्रभाव केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहता। इसका संबंध घरेलू तिलहन किसानों और उनकी उपज की कीमतों से भी होता है। जब विदेशों से सस्ता तेल बड़ी मात्रा में उपलब्ध होता है, तो घरेलू तिलहन की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

यही वजह है कि सरकार को एक ओर उपभोक्ताओं के लिए खाद्य तेल सस्ता रखने और दूसरी ओर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। वर्ष 2024 में सरकार ने घरेलू तिलहन किसानों को समर्थन देने के उद्देश्य से खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाया था। उस समय सरकार ने कहा था कि सस्ते आयात से घरेलू सोयाबीन जैसी फसलों की कीमतों पर दबाव पड़ रहा था।

मौजूदा फैसला इस नीति के दूसरे पहलू को दर्शाता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के समय उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले बोझ को कम करने पर जोर दिया गया है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार की भूमिका अहम

भारत के खाद्य तेल बाजार पर वैश्विक कीमतों का प्रभाव काफी महत्वपूर्ण है। पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के अंतरराष्ट्रीय उत्पादन, मौसम, निर्यात नीति, परिवहन लागत और वैश्विक मांग में बदलाव से भारतीय बाजार की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।

इसलिए आयात शुल्क में कटौती घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने का एक उपाय है, लेकिन यह अकेला कारक नहीं है। यदि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो शुल्क में कमी का लाभ सीमित हो सकता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय कीमतें स्थिर या नरम रहती हैं तो शुल्क कटौती का असर अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।

बाजार में आगे क्या देखने को मिलेगा?

अब नजर इस बात पर रहेगी कि आयातक और खाद्य तेल कंपनियां शुल्क में कमी का लाभ किस हद तक बाजार में स्थानांतरित करती हैं। साथ ही, आने वाले त्योहारी दिनों में मांग और अंतरराष्ट्रीय कीमतों की दिशा भी महत्वपूर्ण होगी।

कच्चे सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी शून्य होने और पाम तथा सोयाबीन तेल पर इसे 5 प्रतिशत किए जाने से आयात लागत की संरचना में बदलाव आया है। सरकार ने साथ ही कच्चे और रिफाइंड तेल के बीच 19.25 प्रतिशत का अंतर बनाए रखा है, जिससे घरेलू रिफाइनिंग को समर्थन देने की नीति भी जारी रहती है।

कुल मिलाकर, केंद्र का यह कदम खाद्य तेलों की बढ़ती लागत और त्योहारी मौसम में संभावित अतिरिक्त मांग के बीच बाजार पर दबाव कम करने की कोशिश के रूप में सामने आया है। इसका अंतिम लाभ उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचता है, यह आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय कीमतों, आयात लागत, घरेलू मांग और बाजार में कीमतों के समायोजन पर निर्भर करेगा।