फ़रवरी 14, 2026

संकट में आशा की झलक: सूडान के संघर्ष के बीच अबूबक्र गैरेलबेई की प्रेरणादायक

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Anoop singh

सूडान—एक ऐसा देश जो पिछले दो वर्षों से भी अधिक समय से संघर्ष, हिंसा और मानवीय संकट से जूझ रहा है। जहां गोलियों की आवाज़ें आम हैं और विस्थापन एक दिनचर्या बन गई है, वहीं इस अंधकार के बीच उम्मीद की कुछ रोशनियां भी दिखाई देती हैं। इन्हीं रोशनियों को दुनिया के सामने लाने का काम कर रहे हैं अबूबक्र गैरेलबेई (Abubakar Garelnabei), जो वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम (WFP) में डॉक्यूमेंटेशन ऑफिसर के रूप में कार्यरत हैं।

मानवता को कैद करता एक कैमरा

अबूबक्र का कार्य केवल एक युद्ध क्षेत्र की रिपोर्टिंग करना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि वहाँ के लोग किस प्रकार हर परिस्थिति में अपनी गरिमा, सहनशक्ति और मानवीय संवेदना को बचाए हुए हैं। उनके कैमरे के लेंस से निकलने वाली तस्वीरें सूडान के उस चेहरे को दिखाती हैं, जिसे वैश्विक मीडिया शायद ही कभी दिखा पाए।

बंजर धरती, जले हुए घर, और डर से भरी आंखों के बीच, अबूबक्र उन पलों को भी कैद करते हैं जहां एक माँ अपने बच्चे को मुस्कराकर खिलौना थमा रही है, जहां बच्चे स्कूल के खंडहरों में पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, और जहां एक पड़ोसी दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ने का साहस दे रहा है।

आंकड़ों से परे की सच्चाई

जहां अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और समाचार एजेंसियां सूडान को केवल विस्थापितों की संख्या, मृतकों के आंकड़ों और राहत सामग्री की कमी से जोड़ती हैं, वहीं अबूबक्र की कहानियां हमें यह याद दिलाती हैं कि हर संख्या के पीछे एक इंसान है—जिसकी अपनी कहानी, भावनाएं और सपने हैं।

उनकी फोटोग्राफी केवल तस्वीरें नहीं होतीं, बल्कि यह संघर्ष में जी रहे लोगों की आत्मा की आवाज़ बन जाती हैं। उनकी हर छवि एक मौन क्रंदन भी है और एक अडिग विश्वास भी—कि यह तूफान भी गुजर जाएगा।

वैश्विक दर्शकों से सीधा संवाद

अबूबक्र की तस्वीरें और कहानियां केवल सूचना देने का कार्य नहीं करतीं, बल्कि वे विश्व समुदाय को इस संकट के प्रति संवेदनशील और सक्रिय बनाती हैं। वे यह जताती हैं कि केवल राहत सामग्री भेजना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि वहां के लोगों के आत्मसम्मान और आत्मबल को भी समझना और सम्मान देना जरूरी है।

निष्कर्ष

अबूबक्र गैरेलबेई जैसे लोग हमें यह सिखाते हैं कि युद्ध, गरीबी और आपदा के बीच भी आशा की किरणें बची रहती हैं। उनकी डॉक्यूमेंटेशन एक आइना है जिसमें सूडान के लोगों की पीड़ा के साथ-साथ उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और सामूहिक चेतना भी स्पष्ट झलकती है।

इस असाधारण कार्य के ज़रिए अबूबक्र न केवल सूडान की कहानी कह रहे हैं, बल्कि वे यह भी साबित कर रहे हैं कि मानवता कभी मरती नहीं, बस सही लेंस से देखे जाने की आवश्यकता होती है।


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