अंतरराष्ट्रीय यातना पीड़ित समर्थन दिवस: मानव गरिमा और न्याय के लिए वैश्विक प्रतिबद्धता(26 जून 2025)

हर वर्ष 26 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय यातना पीड़ित समर्थन दिवस न केवल अमानवीय यातना की भयावहता की याद दिलाता है, बल्कि यह एक ऐसा अवसर है जब दुनिया भर के देश और समाज इस क्रूर प्रथा के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होते हैं। यह दिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित किया गया था ताकि उन लोगों के साहस और संघर्ष को सम्मानित किया जा सके, जिन्होंने यातना का सामना किया और आज भी न्याय और पुनर्वास की राह पर डटे हुए हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह दिवस?
1. यातना के खिलाफ वैश्विक आवाज़
इस दिन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यातना को कभी भी किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। भले ही अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत यातना पूर्ण रूप से निषिद्ध है, फिर भी यह आज भी कुछ देशों में गुप्त जेलों, संघर्ष क्षेत्रों या पुलिस हिरासतों में जारी है।
2. पीड़ितों के साथ एकजुटता
यह दिन यातना पीड़ितों के साथ संवेदना और समर्थन जताने का अवसर है। यह उनके साहस को सलाम करता है और उनके अनुभवों को दुनिया के सामने लाने में मदद करता है, ताकि समाज उनके पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठा सके।
3. निवारण के प्रयासों पर बल
यातना को रोकने के लिए कड़े कानून, पुलिस और सुरक्षा बलों की प्रशिक्षण व्यवस्था, और पारदर्शिता को बढ़ावा देना आवश्यक है। यह दिन इस दिशा में सभी सरकारों को जागरूक और सक्रिय रहने की प्रेरणा देता है।
4. पुनर्वास और सहारा
यातना केवल शारीरिक नहीं होती, यह मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी गहरे घाव छोड़ती है। अतः पीड़ितों को समुचित चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक सहयोग, कानूनी सहायता और सामाजिक पुनःस्थापन की आवश्यकता होती है, जिसे यह दिवस प्रमुखता से उजागर करता है।
5. दोषियों को सजा दिलाना
यातना के अपराधियों को सजा दिलाना न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है। यह दिन न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करने और दंड से छूट की संस्कृति को समाप्त करने का आह्वान करता है।
निष्कर्ष:
अंतरराष्ट्रीय यातना पीड़ित समर्थन दिवस सिर्फ एक स्मरण दिवस नहीं है, यह कार्रवाई का दिन है। यह हम सभी को यह याद दिलाता है कि यातना एक अपराध है, न कि कोई नीति। यह दिवस प्रत्येक नागरिक, संस्था और सरकार से यह अपील करता है कि वे एक ऐसे समाज की रचना करें जहाँ मानव अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो और कभी भी, कहीं भी यातना को सहन नहीं किया जाए।
👉 यह हमारा नैतिक और कानूनी दायित्व है कि हम पीड़ितों के साथ खड़े हों, उनकी आवाज़ बनें, और एक न्यायपूर्ण दुनिया के निर्माण में भागीदार बनें।
