फ़रवरी 14, 2026

भारत की नियोजित अर्थव्यवस्था के वास्तुकार: पी.सी. महालनोबिस की विरासत | 28 जून 2025

0
Anoop singh

आज, भारत के प्रसिद्ध सांख्यिकीविद और योजना आयोग के निर्माता प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए न केवल उनकी विद्वत्ता को सराहा, बल्कि उनके द्वारा स्थापित योजनात्मक दृष्टिकोण की भी याद दिलाई, जो आज के भारत में कहीं खोता सा प्रतीत होता है।

🔹 पी.सी. महालनोबिस: भारत में आधुनिक सांख्यिकी के जनक

प्रोफेसर महालनोबिस ने भारतीय सांख्यिकीय संस्थान (ISI) की स्थापना की और सांख्यिकीय तरीकों को राष्ट्रीय योजना का आधार बनाया। उनकी सबसे उल्लेखनीय देन थी योजना आयोग की अवधारणा, जो भारत की स्वतंत्रता के बाद विकास की रीढ़ बना। उन्होंने ‘महालनोबिस मॉडल’ के ज़रिए द्वितीय पंचवर्षीय योजना की संरचना की, जिसमें भारी उद्योगों पर ज़ोर दिया गया था।

🔹 नेताजी की प्रेरणा, नीति में विज्ञान की सोच

नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रेरित होकर महालनोबिस ने विज्ञान और सांख्यिकी को प्रशासनिक और विकासात्मक नीतियों में जोड़ा। उनका मानना था कि डेटा-आधारित नीतियाँ ही वास्तविक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। इसीलिए उन्होंने योजनाओं को केवल आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि ठोस आँकड़ों और वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित रखा।

🔹 योजना आयोग से नीति आयोग तक: क्या खो गया?

2014 में योजना आयोग को समाप्त कर उसकी जगह नीति आयोग को लाया गया, जिससे एक नई, अधिक लचीली और सहकारी संघवाद की रूपरेखा सामने आई। परंतु, ममता बनर्जी सहित कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसके साथ ही दीर्घकालिक और संस्थागत विकास की सोच को भी कमजोर किया गया। योजना आयोग के पास न केवल नीति निर्धारण की शक्ति थी, बल्कि राज्य सरकारों के साथ गहरे समन्वय का भी एक ढांचा था।

🔹 आज के संदर्भ में महालनोबिस की प्रासंगिकता

आज जब भारत तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से नए शिखर छूने की बात कर रहा है, तब महालनोबिस की सोच फिर से प्रासंगिक हो उठी है। वे हमें याद दिलाते हैं कि विकास केवल नारे और योजनाओं से नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित संस्थागत ढांचे और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से आता है

🔹 निष्कर्ष: एक युगद्रष्टा की वाणी का स्मरण

महालनोबिस की स्मृति में ममता बनर्जी की बातें केवल श्रद्धांजलि नहीं थीं, बल्कि एक चेतावनी भी थीं कि हम कहीं अपने नियोजन और दूरदृष्टि की संस्कृति को खो तो नहीं रहे। उनके सिद्धांत और सोच आज के नीति-निर्माताओं के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकते हैं, बशर्ते हम उन्हें सही संदर्भ में समझें और अपनाएँ।


प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

इन्हे भी देखें