कमज़ोर मानसून की मार: बिहार, आंध्र प्रदेश और असम में धान की फसल पर खतरा

नई दिल्ली, 10 जुलाई 2025 – देश के कई प्रमुख धान उत्पादक राज्य इस बार कमजोर मानसून की चपेट में आ गए हैं। CareEdge Ratings की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, आंध्र प्रदेश और असम जैसे राज्यों में अब तक सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे इन राज्यों में खरीफ फसल विशेषकर धान की बुआई प्रभावित हुई है।
पिछले वर्ष इन तीन राज्यों ने देश के कुल धान उत्पादन में लगभग 15% का योगदान दिया था, लेकिन इस साल मानसून की सुस्त चाल ने इन इलाकों की कृषि अर्थव्यवस्था को चिंताओं से भर दिया है।
कहाँ कितनी बारिश, क्या असर
रिपोर्ट के मुताबिक, जून की शुरुआत से ही इन राज्यों में वर्षा में गिरावट दर्ज की जा रही है। हालांकि जुलाई की शुरुआत में मानसून कुछ हद तक सक्रिय हुआ है, जिससे थोड़ी राहत मिली है। भारत के कुल 36 मौसम उपविभागों में से 15 क्षेत्रों में सामान्य वर्षा हुई है, जो कि देश के लगभग 43% क्षेत्रफल को कवर करते हैं। इसके उलट, 7 उपविभागों में गंभीर वर्षा की कमी पाई गई है।
यह विषमता देश भर में वर्षा वितरण के असमान स्वरूप को दर्शाती है, जो खेती-बाड़ी के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश, तो कुछ में सूखे जैसे हालात ने मौसम की अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।
मानसून की चाल: शुरूआत तेज, फिर मंद
इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून ने समय से पहले दस्तक दी, जिससे किसानों को शुरुआत में आशा बंधी। लेकिन जून के मध्य में मानसून की रफ्तार धीमी पड़ गई, जिससे बुआई की प्रक्रिया बाधित हुई। बाद में, जून के अंतिम सप्ताह में मानसून ने फिर से गति पकड़ी और जुलाई 7 तक देश में औसत से 15% अधिक वर्षा दर्ज की गई।
क्षेत्रीय प्रदर्शन: उत्तर और मध्य भारत आगे
उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में मानसून अपेक्षाकृत बेहतर रहा। यहाँ वर्षा क्रमशः 37% और 42% लंबी अवधि औसत (LPA) से अधिक रही है। इसका लाभ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों को मिला, जहाँ बुआई की रफ्तार तेज हो गई है।
वहीं, दक्षिण भारत में वर्षा LPA से 1% कम रही और पूर्वोत्तर तथा पूर्वी भारत में 20% की भारी कमी देखी गई, जिससे असम, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में खरीफ फसल की संभावनाएं कमजोर हुई हैं।
आशा की किरण: बुआई में अब तेजी
हालांकि वर्षा वितरण में भिन्नता रही है, फिर भी रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में बुआई गतिविधियों में धीरे-धीरे वृद्धि देखने को मिल रही है। यह संकेत है कि यदि मानसून आने वाले हफ्तों में स्थिर बना रहा, तो फसलें पुनः पटरी पर आ सकती हैं।
निष्कर्षतः, भारत के कृषि पर निर्भर राज्यों के लिए मानसून जीवनरेखा है। मौसम के उतार-चढ़ाव के इस दौर में सरकार और किसान, दोनों को सतर्क रहने की जरूरत है ताकि फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर कोई बड़ा संकट न आए।
