फ़रवरी 13, 2026

मौर्य प्रशासन व्यवस्था: एक अद्वितीय और संगठित शासकीय ढांचा

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भारत के प्राचीन इतिहास में मौर्य साम्राज्य एक ऐसे युग का प्रतीक है, जिसने न केवल राजनीतिक एकता स्थापित की बल्कि एक सुदृढ़ और संगठित प्रशासनिक व्यवस्था भी विकसित की। चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित यह साम्राज्य मौर्य वंश की बौद्धिक परिपक्वता और नीति कौशल का जीवंत उदाहरण है। मौर्य प्रशासन व्यवस्था की नींव चाणक्य (कौटिल्य) द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ में निहित सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसने शासन प्रणाली को एक नई दिशा दी।


🔷 केन्द्रीय प्रशासन

मौर्य काल की प्रशासनिक प्रणाली अत्यंत केन्द्रीयकृत थी। सम्राट सर्वोच्च शासक होता था, जिसके अधीन समस्त अधिकार केंद्रित थे। राजा के निर्णय सर्वोपरि होते थे और वही नीति निर्धारण करता था। लेकिन इसके साथ-साथ मंत्रिपरिषद, जिसमें पुरोहित, सेनापति, युवराज, महामात्य आदि सम्मिलित होते थे, शासक को परामर्श देती थी।

महामात्य, मौर्य प्रशासन का एक प्रमुख पदाधिकारी था, जो राजा का मुख्य सलाहकार एवं प्रशासनिक प्रमुख होता था।


🔷 विभागीय प्रशासन

मौर्य शासन में विभिन्न विभागों का सुसंगठित तंत्र था, जिनका संचालन योग्य अधिकारियों द्वारा किया जाता था। कुछ प्रमुख विभाग इस प्रकार थे:

  1. वाणिज्य विभाग – व्यापार, कर और बाजार दरों को नियंत्रित करता था।
  2. नगर विभाग – नगरों की सफाई, सुरक्षा और संरचना की निगरानी करता था।
  3. सेना विभाग – देश की रक्षा व्यवस्था का संचालन करता था।
  4. कृषि विभाग – सिंचाई, खेती और भूमि के बंटवारे का कार्य देखता था।
  5. यातायात एवं संचार विभाग – सड़क, डाक व्यवस्था और संदेशवाहकों की निगरानी करता था।

🔷 प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन

सम्राट की सत्ता को सुचारू रूप से लागू करने के लिए साम्राज्य को कई प्रांतों (जनपदों) में बांटा गया था। प्रत्येक प्रांत में एक कुमार आमात्य या राजुक नियुक्त किया जाता था, जो राजा का प्रतिनिधि होता था।

प्रांतों को आगे जिलों (विष) और फिर ग्रामों (ग्रामिक) में विभाजित किया गया था। ग्राम स्तर तक प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए जाते थे, जो स्थानीय मामलों की देखरेख करते थे।


🔷 कर प्रणाली और आर्थिक प्रशासन

मौर्य प्रशासन की कर प्रणाली भी सुव्यवस्थित थी। राजस्व का मुख्य स्रोत भू-कर (भूमि से कर) था, जिसे खेती के उत्पाद के आधार पर निर्धारित किया जाता था। इसके अतिरिक्त खनिज, वन, व्यापार, पशुपालन, और शिल्प आदि से भी कर वसूला जाता था।

समाहरणक (Collector) और संविद्धातृ (Accountant) जैसे अधिकारी कर संकलन और लेखा जोखा संभालते थे।


🔷 न्याय व्यवस्था

न्यायिक प्रशासन में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। उसके अधीन धर्मस्थ (न्याय अधिकारी) और प्रासस्त (दंडाधिकारी) होते थे। अपराध के अनुसार दंड निश्चित किए जाते थे और सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रयास किया जाता था।


🔷 गुप्तचर प्रणाली

मौर्य शासन की सबसे विशिष्ट विशेषता थी इसकी गुप्तचर व्यवस्था। कौटिल्य ने इस प्रणाली को विशेष महत्व दिया। गुप्तचर (जासूस) भेष बदलकर जनमानस और अधिकारियों की गतिविधियों पर निगरानी रखते थे। इससे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और कुशल शासन सुनिश्चित किया जाता था।


🔷 सम्राट अशोक और धर्म आधारित प्रशासन

सम्राट अशोक के काल में प्रशासन में एक नई विचारधारा का प्रवेश हुआ – धर्म नीति। अशोक ने ‘धम्म महापात्रों’ की नियुक्ति की जो सामाजिक समरसता, नैतिक शिक्षा और जनकल्याण के कार्यों में लगे रहते थे। अशोक ने स्तंभ लेखों और शिलालेखों के माध्यम से अपने प्रशासन की पारदर्शिता और नीति का प्रचार किया।


🔷 निष्कर्ष

मौर्य प्रशासन व्यवस्था एक प्राचीन लेकिन आधुनिक दृष्टिकोण से प्रेरित प्रणाली थी, जिसमें केंद्रीकृत सत्ता, योग्य अधिकारी, संगठित विभाग, न्यायपूर्ण प्रणाली और सुदृढ़ गुप्तचर नेटवर्क सम्मिलित थे। आज भी मौर्य प्रशासन के कई पहलू भारतीय प्रशासनिक प्रणाली में प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

यह प्रशासनिक व्यवस्था चाणक्य की दूरदृष्टि, चंद्रगुप्त की नेतृत्व क्षमता और अशोक की मानवतावादी सोच का समन्वित परिणाम थी, जिसने मौर्य साम्राज्य को भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे शक्तिशाली और संगठित साम्राज्य बना दिया।


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