बिहार में विशेष पुनरीक्षण पर एनएसयूआई का उग्र प्रदर्शन: लोकतांत्रिक प्रक्रिया या सियासी दबाव?
प्रकाशन तिथि: 24 जुलाई 2025
स्थान: पटना, बिहार
बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में तूफान ला दिया है। इसी कड़ी में गुरुवार को पटना की सड़कों पर एनएसयूआई (राष्ट्रीय छात्र संघ) के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाज़ी की। यह प्रदर्शन बाद में उग्र हो गया, जिससे प्रशासन को बल प्रयोग करना पड़ा।
प्रदर्शन की पृष्ठभूमि: केवल मतदाता सूची या कुछ और?
चुनाव आयोग द्वारा संचालित इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है और इसके पीछे सत्ता पक्ष की “मतदाता हेरफेर रणनीति” काम कर रही है। एनएसयूआई का यह प्रदर्शन इसी असंतोष की अभिव्यक्ति माना जा रहा है।
घटनाक्रम: सड़कों पर टकराव, पुलिस की बौछार
एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने जैसे ही डाकबंगला चौराहा पर मार्च निकाला, पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। स्थिति तब बिगड़ी जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ दी। पुलिस ने पहले समझाने की कोशिश की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो जल बौछारें और हल्का बल प्रयोग करना पड़ा। दर्जनों कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।
कांग्रेस का तीखा हमला: “बेरोजगारी और कुशासन का प्रतीक है ये सरकार”
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. शकील अहमद खान ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा,
“बिहार की मौजूदा सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचल रही है। बेरोजगारी चरम पर है, शिक्षा और स्वास्थ्य ढह चुके हैं, और अब मतदाता सूची को भी राजनीति का उपकरण बना दिया गया है।”
उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस युवाओं की आवाज़ बनने को तैयार है और “यह लड़ाई सिर्फ सूची की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की है।”
प्रशासन की प्रतिक्रिया: “जनजीवन बाधित, कानून तोड़ने की अनुमति नहीं”
पटना के एडीएम (विधि-व्यवस्था) गोविंद पांडे ने कहा कि प्रदर्शन से शहर के कई हिस्सों में यातायात बाधित हुआ।
“स्कूल बसें, आपातकालीन वाहन और आम नागरिक कई घंटों तक जाम में फंसे रहे। किसी को भी कानून हाथ में लेने की छूट नहीं दी जा सकती।”
निष्कर्ष: प्रदर्शन, राजनीति और जनता के सवाल
बिहार में NSUI का यह आंदोलन केवल एक छात्र संगठन का असंतोष नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। जहां एक ओर विपक्ष इसे “लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई” बता रहा है, वहीं प्रशासन इसे “कानून व्यवस्था को चुनौती” मान रहा है। ऐसे में सवाल उठता है — क्या ये विरोध लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक है, या फिर चुनावी मौसम की गर्मी में उगता राजनीतिक शो?
लेखक टिप्पणी:
यह स्थिति बताती है कि बिहार में सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रियाओं पर भरोसे की भी लड़ाई लड़ी जा रही है। और जब तक युवाओं के असली मुद्दों पर ठोस संवाद नहीं होगा, सड़कें यूं ही राजनीतिक रंग लेती रहेंगी।
